Tuesday, April 28, 2026
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द्रोपदी का अक्षय पात्र…..के.सी.राजपूत

द्रोपदी का अक्षय पात्र…

 

कुरुराज धृतराष्ट्र ही हैं, नगर हस्तिनापुर के महाराज ।

शकुनि, दुर्योधन, कर्ण, अन्य की बनी चौकड़ी आज ।

दुर्बुद्धि दुर्योधन, शकुनि मामा, संग खेलेगा एक खेल ।

कौरवजन आजन्म दुष्ट हैं, वह कभी न रखते मेल ।।

दुर्जन मामा शकुनि के संग में, नित्य करते नए प्रपंच ।

ध्यूत क्रिया के हेतु सभी ने, वृहद सजा दिया है मंच ।।

एक ओर दुर्योधन मंडली, दूसरी ओर है पांडु पुत्र ।

शकुनि दुष्ट मंडली संकेत से, शुरू हो जाएगा सत्र ।।

शकुनि ने पासे चले और, वह जीत रहा है बाजी ।।

थे धर्मपुत्र नहीं चाहते, पर होना पड़ा है राजी ।।

हर बार विजय करता रहा,दुर्योधन हर एक बाजी।

धर्मपुत्र पार न पा सके, बस बात यही है ताजी ।।

अंतिम बाजी हार कर, प्रथा पुत्र ने पाया है बनवास ।

रानी द्रौपदी को जीत कर, कौरव करते हैं परिहास ।।

अस्त्र सभी लोटा करके, दिया वर्ष बारह का वनवास ।

काटेंगे एक वर्ष अज्ञात भी, यह बात रही थी खास ।।

प्रणाम किया धृतराष्ट्र को, पांडव चल दिए वन में ।

घर आने तक राज्य न मिले, तो निर्णय होगा रण में ।।

पल-पल पांडु पुत्रों ने वन में, काटा बहुत ही दुख में ।

पिछला सारा काल दोहर रहा,जो काटा था सुख में ।।

पांडव और कृष्णा ही केवल, थे नहीं अकेले वन में ।

अन्न पूर्ति होगी कैसे होगी, यह चिंता आई थी मन में।।

अनुयाई, सेवक, किसान,द्विज आए थे उनके संग में ।

बहुत बड़ी भोजन की चिंता, कैसे हल होगी जंगल में ।।

क्षमा प्रार्थना करें आप सभी, प्रियजन लोटो घर को ।

अनुयाई नहीं मानते, पांडव जोड़ रहे सब कर को।।

हम सब सहभागी रहेंगे, आपके सुख और दुख में ।

सुख तो साथ में भोगे, अब नहीं छोड़ेंगे दुख में ।।

तब ही सौनक मुनि पधारे, श्री धर्मराज के पास ।

मिलकर एक युक्ति सोच ली, यह बात बड़ी है खास ।

आह्वान करो दिनकर का, कुंती सुत करो सूर्योपासन ।

धर्मपुत्र कानन में ही, लगाकर बैठ गए तब आसन।।

की कठिन तपस्या पांडु पुत्र ने, सविता हुए प्रसन्न ।

निश्चिंत रहो धर्मपुत्र तुम, मैं पूरा कर दूंगा अन्न ।।

देखो संभालो यह अक्षय पात्र, यह देगा सबको अन्न।

छोड़ो तुम सारी चिंताएं, अब मन को करो प्रसन्न ।।

याज्ञसैनी नहीं खायेगी तब तक, भोजन देगा भरपूर ।

मिलकर तुम सभी परोसो, तब भी भरा रहे भंडार ।

चाहे जितना खूब खिलाओ, होगा पर पूरित आगार।।

होगा परिपूरित आगार …

होगा परिपूरित आगार…

के.सी.राजपूत

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