गीता श्लोक 5/ 22 …
विषयों से विरक्त होनी चाहिए.. .. भगवान कहते हैं कि __क्योंकि हे कुंतीनंदन अर्जुन ! जो विषयों और विषयों के सहयोग से पैदा होने वाले भोग हैं, वह आदि अंत वाले और दुख के कारण हैं । अतः विवेकशील मनुष्य उसमें रमण नहीं करता ।
भोग __शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गंध इन विषयों से इंद्रियों का राग पूर्वक संबंध होने पर जो सुख प्राप्त होता है, उसे भोग कहते हैं ।
सुख__सुख सुविधा और मान बढ़ाई मिलने से प्रसन्न होना भोग है । अपनी बुद्धि से जिस सिद्धांत का आधार है, दूसरे व्यक्ति उसी सिद्धांत की प्रशंसा सुनकर जो प्रसन्नता होती है,वह सुख होता है। वह भी एक प्रकार का भोग है । परमात्मा के सिवाय जितने भी प्रकृति जन्य प्राणी पदार्थ परिस्थितियों अवस्थाएं आदि हैं, उनमें किसी भी प्रकृति जन्य कारण के द्वारा सुख की अनुभूति करना भोग है ।
संपूर्ण भोग आदि और अंत वाले हैं, अनित्य हैं,परिवर्तनशील हैं, यह कभी एक रूप नहीं रह सकते, इन लोगों को स्वयं के साथ किसी भी अंश में एकता नहीं है । भोग आने जाने वाले हैं और स्वयं अर्थात भगवान आदि अंत से रहित हैं ।
गीता श्लोक 5/23 …..
सुखी कौन है ?
भगवान कहते हैं कि_ इस मनुष्य शरीर में जो कोई मनुष्य शरीर छूटने से पहले ही काम, क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है ।
प्राणी को एक अलौकिक विवेक प्राप्त है । यह विवेक पशु, पक्षी आदि योनि में सुप्त अवस्था में रहता है । उनमें केवल अपनी अपनी योनि के अनुसार शरीर निर्वाह मात्र का विवेक रहता है । देव आदि योनियों में यह विवेक ढका रहता है, क्योंकि वह योनियां भोग योनियां हैं और भोगों के लिए मिलती है । अतः उनमें भोगों की बहुलता तथा भोगों का उद्देश्य रहता है । मनुष्य योनि में भी भोगी और संग्राही मनुष्य का विवेक ढका रहता है । ढके रहने पर भी यह विवेक मनुष्य को समय-समय पर भोग और संग्रह में दुख एवं दोष का दर्शन कराता रहता है । मनुष्य को ऐसा दुर्लभ अवसर प्राप्त है, जिसमें वह काम क्रोध पर विजय प्राप्त करके सदा के लिए सुखी हो सकता है ।
गीता श्लोक 5/24 …
सुख की महिमा ….
भगवान कहते हैं कि जो मनुष्य केवल परमात्मा में सुख वाला और केवल परमात्मा में रमण करने वाला है तथा जो केवल परमात्मा में ज्ञान वाला है, ब्रह्म में अपनी स्थिति का अनुभव करने वाला है, ब्रह्म रूप बना हुआ है, वह सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त होता है ।
जिसको प्रकृति जन्य वाह्य पदार्थ में सुख प्राप्त नहीं होता वरन एकमात्र परमात्मा में ही सुख मिलता है, ऐसे साधक को इस लोक में अंतरसुख वाला कहा गया है ।
परमात्मतत्व के सिवाय कहीं भी उसकी सुख बुद्धि नहीं रहती । परमात्मतत्व में सुख का अनुभव उसे हर समय होता है, क्योंकि उसके सुख का आधार वाह्य पदार्थ का सहयोग नहीं होता ।वाह्य _ जो सदा के लिए न मिले और सभी को न मिले, वह वाह्य है । परंतु जो सदा के लिए मिले और सभी को मिले, वह अभ्यंतर है । जो भोगों में रमन नहीं करता, परंतु केवल परमात्मा में ही रमण करता है और व्यवहार काल में भी जिसका एकमात्र परमात्मतत्व में ही व्यवहार हो रहा है, ऐसे साधक को अंतराम कहा गया है ।
गीता श्लोक 5/25 ….
निर्वाण ब्रह्म के प्राप्तकर्ता कौन? भगवान कहते हैं कि जिनके शरीर, मन, बुद्धि, इंद्रियों सहित वश में है, जो संपूर्ण प्राणियों के हित में रत यानी कि लगे हुए हैं, जिनके संपूर्ण संशय मिट गए हैं, जिनके संपूर्ण दोष नष्ट हो गए हैं, वह विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ।
नित्य तत्व की प्राप्ति का दृढ़ लक्ष्य होने के कारण साधकों को शरीर,इंद्रियां, मन,बुद्धि बस में करने नहीं पड़ते वरन वे स्वाभाविक ही सुगमता पूर्वक उनके बस में हो जाते हैं बस में होने के कारण इनमें राग द्वेष आदि द्वेषों का अभाव हो जाता है और उनके द्वारा होने वाली प्रत्येक क्रिया दूसरों का हित करने वाली होती है ।
जब तक तत्व प्राप्ति का दृढ़ निश्चय नहीं होता, तब तक अच्छे-अच्छे साधकों के अंतःकरण में भी कुछ न कुछ दुविधा विद्यमान रहती है । दृढ़ निश्चय होने पर साधकों को अपनी साधना में कोई संशय विकल्प भ्रम आदि नहीं रहता और वह तत्परता पूर्वक अपने साधन में लगे रहते हैं । अपने विवेक को महत्व देने वाले यह साधक भी ऋषि ही हैं ।
गीता श्लोक 5/26 ….
निर्वाण ब्रह्म की प्राप्ति पर क्या अनुभव होता है?
भगवान कहते हैं कि काम,क्रोध से सर्वथा रहित जीते हुए मन वाले और स्वरूप का साक्षात्कार किए हुए सांख्य योगियों के लिए सब ओर से शरीर के रहते हुए अथवा शरीर छूटने के बाद निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है अर्थात चारों ओर से विद्यमान है ।
सिद्ध महापुरूष में काम, क्रोध पर दोषों की गंध भी नहीं रहती । काम, क्रोध आदि दोष उत्पत्ति, बिनाशशील असत पदार्थों के संबंध से उत्पन्न होते हैं । सिद्ध महापुरूष को उत्पत्ति, विनाश रहित सत्य तत्व में अपनी स्वाभाविक स्थिति का अनुभव हो जाता है । अतः उत्पत्ति विनाशशील सत्य पदार्थ से उनका संबंध सर्वथा नहीं रहता ।
साधन करने से काम,क्रोध कम होते हैं । ऐसा साधकों का अनुभव है । जो चीज कम होने वाली होती है, वह मिटने वाली होती है । अतः जिस साधन से यह काम, क्रोध कम होते हैं । उस साधन से यह मिट भी जाते हैं । जब तक सत्य का संबंध रहता है, तब तक मन बस में नहीं रहता । सत्य का संबंध सर्वथा न रहने से महापुरुषों का कह लाने वाला मन स्वतः ही बस में रहता है ।
गीता श्लोक 5/27, 5/28 ….
कर्मयोगी, ज्ञान योगी और ध्यान योगी एक ही प्रकार के तत्व को प्राप्त कर सकते हैं….
भगवान कहते हैं कि बाहर के पदार्थ को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भोंहों के बीच में स्थित करके तथा नासिक में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके जिसकी इंद्रियां, मन और बुद्धि अपने वश में है और केवल मोक्ष परायण हैं तथा जो इच्छा भय और क्रोध से सर्वथा रहित हैं, वह मुनि सर्वथा मुक्त ही है ।
परमात्मा के अतिरिक्त सब पदार्थ बाह्य ही हैं बाह्य पदार्थों को बाहर ही छोड़ देने का तात्पर्य है की मन से बाह्य विषयों का चिंतन न करें, बाह्य पदार्थों के संबंध का त्याग कर्मयोग में सेवा के द्वारा और ज्ञानयोग में विवेक के द्वारा किया जाता है । परंतु यहां भगवान ध्यानयोग के द्वारा बाह्य पदार्थ से संबंध विच्छेद करने की बात कह रहे हैं । ध्यानयोग में एकमात्र परमात्मा का ही चिंतन होने से बाह्य पदार्थ से विमुखता हो जाती है । वास्तव में बाह्य पदार्थ बाधक नहीं है । बाधक तो इनसे राग पूर्वक माना हुआ संबंध है । इस माने हुए संबंध का त्याग करना ही ध्यान योग है । नासिका से बाहर निकलने वाली वायु को प्राण वायु और नासिका से भीतर जाने वाली वायु को अपान वायु कहते हैं । प्राणवायु की गति दीर्घ होती है और अपान वायु की गति लघु होती है । दोनों को सम करने की आवश्यकता होती है ।
गीता श्लोक 5/29 …..
कल्याणकारी भगवत निष्ठा… भगवान कहते हैं कि मुझे सब यज्ञों और तपों का भोक्ता, संपूर्ण लोगों का महान ईश्वर तथा संपूर्ण प्राणियों का शुभ हृदय अर्थात स्वार्थ रहित दयालु और प्रेमी जानकर भक्त शांति को प्राप्त हो जाता है ।
जो मनुष्य कोई शुभ कर्म करता है, तब वह जिससे शुभ कर्म करता है, उन शरीर, इंद्रियां, मन, बुद्धि,पदार्थ आदि को अपना मानता है और इसके लिए शुभ कर्म करता है उस उस कर्म का भोक्ता मानता है ।भगवान कहते हैं कि वास्तव में संपूर्ण शुभ कर्मों का भोक्ता में हूं, क्योंकि प्राणी के हृदय में भगवान विद्यमान है । सभी शुभ कर्मों का भोक्ता भगवान को मनाना चाहिए, लक्ष्य भगवान पर ही रहना चाहिए प्राणी पर नहीं ।
कामना से ही संपूर्ण अशुभ कर्म होते हैं । कामना का त्याग करके केवल भगवान के लिए ही सब कर्म करने से अशुभ कर्म तो स्वरूप अर्थात शरीर से ही नहीं होते तथा शुभ कर्मों से अपना संबंध नहीं रहता । इस प्रकार संपूर्ण कर्मों से सर्वथा संबंध विच्छेद होने पर परम शांति की प्राप्ति होती हो जाती है ।
श्रीमद् भागवद् गीता- के.सी.राजपूत





