Wednesday, April 22, 2026
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मन की सुंदरता स्थाई– *बृजेंद्र सिंह झाला ‘पुखराज’

# मन की सुन्दरता स्थाई

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मन को कंचन कर ले भाई,

मन की सुन्दरता स्थाई ।

अन्य नहीं कोई इससे बढ़ कर,

खूबी जिसमें सदा समाई ।।

परवरिश और संस्कार जो,

व्याप्त हैं मन की सुन्दरता में ।

सदाचार – शालीनता,

शामिल मन की सुन्दरता में ।।

भाईचारा – अपनापन,

चार चाँद लगाऐं सुन्दरता में ।

दिल जीतने की क्षमता एक,

रंग जमाए सुन्दरता में ।।

सुन्दरता के ये ही नमूने,

यादगार बन रह जायेगें ।

जीव प्रयाण भले कर जाये,

छाप छोड़ अपनी जायेंगे ।।

यही अनमोल सम्पत्ति भाई,

और नहीं कोई संग में जाई ।

मनवा जिससे पाये बड़ाई,

मन की सुन्दरता स्थाई ।।

# स्वरचित/मौलिक/सर्वाधिकार सुरक्षित

# बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”,

कोटा (राजस्थान)

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