# मन की सुन्दरता स्थाई
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मन को कंचन कर ले भाई,
मन की सुन्दरता स्थाई ।
अन्य नहीं कोई इससे बढ़ कर,
खूबी जिसमें सदा समाई ।।
परवरिश और संस्कार जो,
व्याप्त हैं मन की सुन्दरता में ।
सदाचार – शालीनता,
शामिल मन की सुन्दरता में ।।
भाईचारा – अपनापन,
चार चाँद लगाऐं सुन्दरता में ।
दिल जीतने की क्षमता एक,
रंग जमाए सुन्दरता में ।।
सुन्दरता के ये ही नमूने,
यादगार बन रह जायेगें ।
जीव प्रयाण भले कर जाये,
छाप छोड़ अपनी जायेंगे ।।
यही अनमोल सम्पत्ति भाई,
और नहीं कोई संग में जाई ।
मनवा जिससे पाये बड़ाई,
मन की सुन्दरता स्थाई ।।
# स्वरचित/मौलिक/सर्वाधिकार सुरक्षित
# बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”,
कोटा (राजस्थान)
मन की सुंदरता स्थाई– *बृजेंद्र सिंह झाला ‘पुखराज’




