Wednesday, April 22, 2026
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भीष्म के जीवन के 6 दॊष- कवि*के.सी.राजपूत*

भीष्म के जीवन के 6 दोष

 

सर सैया पर आसन्न भीष्म, थे याद कर रहे माता ।

महावीर  बिंधा असन में, पड़ा_ पड़ा हरि  ध्याता ।।

वीर पुत्र की याद आ रही, मां गंगा भी दौड़ी आई ।

संवाद हुआ मात् पुत्र में, कुछ तो खुशियां पाईं ।।

दुलार प्यार के साथ मात ने, कर का दिया सहारा ।

जीवनमें सत्कर्म किये पर,ऐसा क्यों भाग्य हमारा।।

भोग रहा क्यों असह कष्ट मैं, अब  सैया पर  लेटा।

कष्ट हरो हे मात ! शीघ्र, पुकार रहा है तेरा  बेटा ।।

क्या मेरे थे  दुष्कर्म बताओ, बोलो  मेरी  मां  गंगा ।

कुछ तो आशीर्वचन कहो,  बस मैं हो जाऊं चंगा ।।

क्षात्र धर्म में कमी नहीं पर, थी आशक्ति अपार ।

आसक्ति कारण ही तेरा,उचित न था व्यवहार।।

जितने शेष बचे कर्म फल, उतने ही लगे हैं  बान।

जैसे कर्म करता है मानव, वैसे फल पाता इंसान ।।

भीष्म तुम्हारी बड़ी प्रतिज्ञाएं,थीं सबसे बड़े प्रमाण ।

मत सोचो जो बीता है, उनका क्यों धरते हो ध्यान।।

की अनीति सत्यवती संग, बना वृद्ध पिताकी भार्या।

शूद्र वंशमें जन्मी बेटी, तुमने बना दी क्षत्रिय आर्या।।

हस्तिनापुर से हो आकर्षित, ले काशीराज की पुत्री ।

विचित्रवीर्य था विवाहसे वंचित,नहीं था बीसा क्षत्री।।

कर तिरस्कार काशीराज का, परसु से भिड़गए रणमें ।

किया अपमान गुरु अपने का, लज्जा नहीं थी मनमें।।

गंधार सुता का ब्याह कराया, जन्म से अंधे सुत से ।

कृष्णा का हुआ वस्त्रहरण, तब देख रहे थे बुत से ।।

कौरव करते रहे अधर्म पर, साथ दिया धृत सुत का ।

कभी नहीं बुद्धि से सोचा, काम किया एक बुत का।।

आगाह किया माता गंगा ने, बता  दिए  सब  दोष ।

कह नहीं सके निज मातासे, बस करते रहगए रोष।।

बस करते रह गए रोस ..

बस करते रह गए रोस…

रचना__ के.सी. राजपूत, कोटा।

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