Wednesday, April 22, 2026
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ग़ज़ल- शायर वेद प्रकाश ‘प्रकाश’

ग़ज़ल

वो जाने चमन वो गुले राना* नहीं मिलता।

दिल जिस पे फ़िदा है वो दिल-आरा* नहीं मिलता।।

*

गर इश्क़ हमें हुस्न को पर्दा नहीं मिलता।

कुछ लुत्फ़ मोहब्बत में ख़ुदाया* नहीं मिलता।।

*

होती न अगर इश्क़ से मासूम ख़ताएँ।

दुनिया में तिरे हुस्न का चर्चा नहीं मिलता।।

*

करदे जो इलाजे दिले बीमारे मोहब्बत।

ऐसा कोई दुनिया में मसीहा* नहीं मिलता।।

*

यूॅ॑ हुस्न के शैदाई* तो मिल जाऍ॑गे लाखों।

कहते हैं जिसे इश्क़े ज़ुलेख़ा* नहीं मिलता।।

*

सहती रही तूफ़ाॅ॑ के थपेड़ों को ये जब तक।

इस उम्र की कश्ती को किनारा नहीं मिलता।।

*

“परकाश” वो पत्थर है उसे दिल नहीं कहते।

जिस दिल में मोहब्बत का उजाला नहीं मिलता।।

*

शब्दार्थ:-

जाने चमन* चमन की जान(महबूब)

गुले राना* फूलों की सुंदरता (महबूब)

दिल आरा* दिल काटने वाला(महबूब)

ख़ुदाया*ईश्वर क़सम,

मसीहा* हक़ीम, वैद्य,

शैदाई*दीवाने,

ज़ुलेख़ा*यूसूफ़ से प्यार करने वाली प्रेमिका का प्यार,

*

वेद प्रकाश “परकाश”

44 बी. शोपिंग सेंटर कोटा (राज0)

मो. 9352602229-6378759991

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