ग़ज़ल
वो जाने चमन वो गुले राना* नहीं मिलता।
दिल जिस पे फ़िदा है वो दिल-आरा* नहीं मिलता।।
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गर इश्क़ हमें हुस्न को पर्दा नहीं मिलता।
कुछ लुत्फ़ मोहब्बत में ख़ुदाया* नहीं मिलता।।
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होती न अगर इश्क़ से मासूम ख़ताएँ।
दुनिया में तिरे हुस्न का चर्चा नहीं मिलता।।
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करदे जो इलाजे दिले बीमारे मोहब्बत।
ऐसा कोई दुनिया में मसीहा* नहीं मिलता।।
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यूॅ॑ हुस्न के शैदाई* तो मिल जाऍ॑गे लाखों।
कहते हैं जिसे इश्क़े ज़ुलेख़ा* नहीं मिलता।।
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सहती रही तूफ़ाॅ॑ के थपेड़ों को ये जब तक।
इस उम्र की कश्ती को किनारा नहीं मिलता।।
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“परकाश” वो पत्थर है उसे दिल नहीं कहते।
जिस दिल में मोहब्बत का उजाला नहीं मिलता।।
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शब्दार्थ:-
जाने चमन* चमन की जान(महबूब)
गुले राना* फूलों की सुंदरता (महबूब)
दिल आरा* दिल काटने वाला(महबूब)
ख़ुदाया*ईश्वर क़सम,
मसीहा* हक़ीम, वैद्य,
शैदाई*दीवाने,
ज़ुलेख़ा*यूसूफ़ से प्यार करने वाली प्रेमिका का प्यार,
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वेद प्रकाश “परकाश”
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ग़ज़ल- शायर वेद प्रकाश ‘प्रकाश’






