जीवन मिला है स्वर्ग जैसा, हमने उसे शिकायतों में खो दिया
लेखक : परमानन्द गोयल, कोटा (राजस्थान)
इंसान की विडंबना देखिए—जो मिला है, उसका सुख वह महसूस नहीं करता और जो नहीं मिला, उसके पीछे जीवन भर दौड़ता है। अगले जन्म में स्वर्ग की चिंता में वह आज की खुशियाँ भूल जाता है। जिस आनंद की तलाश में वह भटक रहा है, उसकी कई झलकियाँ तो आसपास ही बिखरी हैं।
सौ वर्ष पहले का कोई व्यक्ति आज हमारे घर आए तो बिजली, फ्रिज, वाहन और स्मार्टफोन देखकर हमें राजाओं से भी अधिक सुखी मानेगा। फिर भी हम छोटी-छोटी बातों से परेशान हैं। सवाल है—सुविधाएँ इतनी बढ़ीं, फिर संतोष क्यों नहीं बढ़ा?
सुविधाएँ मिलीं, आदत बन गईं
बटन से कमरा रोशन, फ्रिज में ठंडा पानी, वाहन से दूरियाँ कम और फोन से दुनिया हथेली में। जो कभी चमत्कार था, वह आज सामान्य है। बिजली या इंटरनेट बंद हो तो बेचैनी होती है। सुविधाएँ बढ़ीं, पर आभार की आदत घटी।
कई घरों में एसी, बड़ी गाड़ी, हर सुविधा है, फिर भी संतोष नहीं। पड़ोसी ने नई गाड़ी ले ली या रिश्तेदार का घर बड़ा हो गया, तो अपनी उपलब्धियाँ छोटी लगती हैं। कमी सुविधाओं की नहीं, तुलना की आदत सुकून छीन लेती है।
अपनी थाली का सुख पहचानिए
हमारे पास घर है, पर पड़ोसी का बड़ा है। गाड़ी है, पर दूसरे की महँगी है। हम अपनी थाली का स्वाद भूल जाते हैं, क्योंकि नजर दूसरे की थाली पर है।
हम धीमे वाई-फाई से परेशान हैं, जबकि कोई बच्चे की फीस के लिए संघर्ष कर रहा है। यह कहना नहीं कि हमारी परेशानियाँ छोटी हैं, बल्कि अभावों के साथ मिली खुशियों को भी देखना सीखें। जो जीवन हमें मामूली लगता है, वही किसी का सपना हो सकता है।
छोटी खुशियों में भी स्वर्ग है
एक मजदूर दिनभर मेहनत कर लौटता है। न एसी, न महँगा फर्नीचर। शाम को परिवार के साथ सादा भोजन करता है, बच्चों की बातें सुनता है और कहता है—चलो, आज सबने साथ खाया।
कठिनाइयाँ वहाँ भी हैं, पर उस पल में अपनापन और सुकून है। यह गरीबी का महिमामंडन नहीं, बल्कि याद दिलाता है कि सुख सुविधाओं से ही नहीं, रिश्तों और उन्हें महसूस करने की क्षमता से भी मिलता है।
स्वर्ग की शुरुआत सोच से होती है
हर समय शिकायत और तुलना जीवन को सुविधाओं के बीच भी बोझिल बना देते हैं। संतोष, प्रेम और कृतज्ञता साधारण जीवन में भी आनंद भर देते हैं। इसका अर्थ प्रगति छोड़ना नहीं है। आगे बढ़िए, पर भविष्य सँवारने की दौड़ में वर्तमान मत खोइए।
खुशियाँ हमारे आसपास ही हैं
रात को सोने से पहले तीन सवाल पूछिए—आज किस बात ने खुशी दी? किसने दिन आसान बनाया? कौन-सी सुविधा सहज मिली, जिसके लिए धन्यवाद भी नहीं कहा?
शायद किसी अपने का फोन, बच्चे की हँसी, समय पर मिला भोजन या सुबह की ताजी हवा ही इनका उत्तर बन जाए।
जो मिला है, उसका मूल्य समझिए; जो नहीं मिला, उसके लिए प्रयास कीजिए। महत्व समझने के लिए उसे खोने का इंतजार क्यों करें?
पत्ते वही हैं, पेड़ वही है, हवा भी वही है—बस, नजरिया बदलना है। स्वर्ग अपनों की मुस्कान, स्वस्थ शरीर, दो वक्त की रोटी, सिर पर छत और उस मन में है, जिसने शिकायत से अधिक आभार सीख लिया है।
खुशियों की कमी नहीं, कई बार उन्हें देखने वाली नजर की कमी होती है। हम स्वर्ग जैसी खुशियों के बीच ही जी रहे हैं—बस, पहचानना बाकी है।






