ग़ज़ल
शकूर अनवर
उसकी आँखें नीली झीलें।
प्यास लगी तो पी ली झीलें।।
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शोर मचाते हैं जब पंछी।
लगती रंग रंगीली झीलें।।
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कैसा पानी कैसी रंगत।
क़िस्मत में पथरीली झीलें।।
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तुमने लिक्खा सूखी आँखें।
मैं लिखता रेतीली झीलें।।
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अब न रहा ऑंखों में पानी।
अब न रहीं शर्मीली झीलें।।
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तुम सेहरा में रहने वाले।
दामन से क्यूँ सीली झीलें।।
मौसम की सख़्ती से “अनवर”।
बनती हैं बर्फीली झीलें।।
शकूर अनवर
9460851271






