Monday, October 5, 2026
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धर्म और संस्कारों से ही सुरक्षित रहेगा जैन धर्म : निर्यापक श्रमण 108 मुनि श्री योगसागर जी महाराज

महानगरों की ओर पलायन से बदल रहा परिवार और संस्कारों का स्वरूप : गणधर मुनि श्री विवर्धन सागर जी महाराज

कोटा, 04 अक्टूबर । रविवार, आश्विन कृष्ण नवमी के अवसर पर आर.के. पुरम, कोटा स्थित त्रिकाल चौबीसी जैन मंदिर में धर्मप्रभावना का विशेष अवसर बना। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी से निर्यापक श्रमण 108 मुनि श्री योगसागर जी महाराज ससंघ शनिवार सायं 4 बजे विहार कर आर.के. पुरम स्थित जैन मंदिर पहुंचे। वहीं कोटा में चातुर्मासरत गणधर मुनि श्री 108 विवर्धन सागर जी महाराज ससंघ भी रविवार प्रातः 8 बजे आर.के. पुरम पहुंचे। दोनों मुनि संघों का भव्य एवं आत्मीय मिलन जैन मंदिर परिसर में हुआ।

इस अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण 108 मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि जैन दर्शन उसी का है, जो स्वयं को जानने और जीतने का प्रयास करता है। जैन उसे कहते हैं जिसने इंद्रियों और मन को जीत लिया हो। हम ऐसे वीतरागी जिनेंद्र भगवान के उपासक हैं।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन केवल भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण के लिए मिला है। आज भौतिकता की चकाचौंध में धर्म जीवन के एक कोने में सिमटता जा रहा है। मनुष्य की दृष्टि निरंतर बाहर की ओर जा रही है, जबकि धर्म हमें अपनी अंतरात्मा की ओर देखने की दृष्टि प्रदान करता है।

मुनि श्री ने कहा कि आज मनुष्य पढ़-लिखकर भी दुःखी और परेशान है। इसका मूल कारण वास्तविक ज्ञान का अभाव है। वास्तविक ज्ञान आत्मा का ज्ञान है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि किसी मिठाई का नाम सुनने से मिठास का केवल शब्दों के माध्यम से भान हो सकता है, लेकिन मिठास की वास्तविक अनुभूति मिठाई का स्वाद लेने पर ही होती है। उसी प्रकार शब्द, भाषा, शास्त्र और प्रवचन ज्ञान प्राप्त करने के माध्यम हैं, लेकिन आत्मज्ञान की वास्तविक अनुभूति स्वयं आत्मा के अनुभव से होती है।

उन्होंने कहा कि केवल पढ़ना और सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्राप्त ज्ञान को जीवन में उतारना आवश्यक है। धर्म से जुड़कर अपने जीवन को आत्मकल्याण, संयम और सदाचार की दिशा में प्रशस्त करें। यही मनुष्य जीवन की वास्तविक सार्थकता है।

इस अवसर पर दोनों मुनि संघों की आहारचर्या भी आर.के. पुरम स्थित जैन मंदिर में सानंद सम्पन्न हुई।

धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए संस्कार आवश्यक : गणधर मुनि श्री विवर्धन सागर जी

गणधर मुनि श्री 108 विवर्धन सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि वर्तमान शिक्षा पद्धति, रोजगार, विवाह, नौकरी एवं अन्य कारणों से जैन समाज के बंधुओं का बड़े महानगरों की ओर पलायन निरंतर बढ़ रहा है। इस विसंगति के कारण समाज, परिवार और संस्कारों का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है।

उन्होंने कहा कि छोटे शहर और कॉलोनियां धीरे-धीरे खाली होती जा रही हैं, जबकि महानगरों में नौकरी और व्यवसाय के कारण भीड़ बढ़ती जा रही है। महानगरों में नई पीढ़ी धर्म से विमुख होकर भौतिकता की चकाचौंध में उलझती जा रही है। केवल देव-शास्त्र-गुरु का सानिध्य प्राप्त होने पर ही नई पीढ़ी को धर्म और संस्कृति की ओर उन्मुख किया जा सकता है।

मुनि श्री ने कहा कि कभी परिवार की धारणा “हम दो, हमारे दो” थी, अब वह “हम दो, हमारा एक” तक सीमित होती जा रही है। छोटे परिवार, स्वच्छंदता, विजातीय विवाह, लिव-इन रिलेशनशिप जैसी प्रवृत्तियों के बढ़ने से सामाजिक और पारिवारिक संस्कारों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे समय में बच्चों को संस्कार देना अत्यंत आवश्यक है। संस्कार घर से और जैन पाठशाला से ही दिए जाने चाहिए। अगली पीढ़ी को धर्म से जोड़ने का निरंतर प्रयास करना होगा। धर्म, संस्कार और संस्कृति की निरंतरता बनी रहेगी, तभी आने वाली पीढ़ियां जैन धर्म की मूल परंपराओं से जुड़ी रहेंगी।

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

धर्मसभा के दौरान विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालु परिवारों ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया।

प्रशासनिक मंत्री  अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रद्धालु परिवारों द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।

चंदा, अक्षरा एवं समस्त जैन परिवार, छिंदवाड़ा द्वारा कलश स्थापना का पुण्यार्जन किया गया। वहीं दीपेश जी, पदमा जी एवं समस्त परिवार, आंवा वाले परिवार द्वारा भी धार्मिक अनुष्ठान में पुण्यार्जन किया गया।

सुमित सेंकी एवं  मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेंद्र जी, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार, श्रीमती सुशीला बाई-अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार तथा लक्ष्य, दीपिका गोधा एवं जैन मंथन सोशल ग्रुप द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।

धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालुओं द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।

सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ संजय बीना लुहाड़िया परिवार, दादाबाड़ी, कोटा को प्राप्त हुआ।

दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य उपवासरत श्रद्धालुओं को प्राप्त हुआ।

इस अवसर पर मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

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