पर्यावरणविदों ने कहा- शाहाबाद का जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, हाड़ौती की जीवंत पारिस्थितिकी का आधार
शाहाबाद/बाराँ।विश्व पर्यटन दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय सांस्कृतिक निधि (INTACH) बाराँ चैप्टर और चम्बल संसद, कोटा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘प्राकृतिक विरासत यात्रा’ शाहाबाद पहुंची। यात्रा के दौरान पर्यावरणविदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने ‘काशी से बड़नगर सेवा संकल्प यात्रा’ के राष्ट्रीय संयोजक शिवेन्दु सिंह, सह-संयोजक अवनीश कटारे और रथ यात्रा संयोजक रॉबिन सिंह से शिष्टाचार भेंट की। इस दौरान शाहाबाद की समृद्ध जैव विविधता और वन संपदा के संरक्षण के लिए चलाए जा रहे ‘शाहाबाद जंगल बचाओ आंदोलन’ को लेकर विस्तृत विमर्श हुआ।
प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रीय संयोजक शिवेन्दु सिंह से विशेष आग्रह किया कि वे सेवा संकल्प यात्रा के माध्यम से इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर उठाएं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक शाहाबाद के जंगलों की आवाज पहुंचाएं, ताकि केंद्र सरकार के स्तर से इस संवेदनशील प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के लिए आवश्यक नीतिगत हस्तक्षेप हो सके।
विकास का विरोध नहीं, संतुलित नीतियों की जरूरत
चम्बल संसद के संरक्षक यज्ञदत्त हाड़ा ने कहा कि शाहाबाद का जंगल हाड़ौती और पूरे राजस्थान के जलस्रोतों, वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों के जीवन से जुड़ा एक अनिवार्य पारिस्थितिकी तंत्र है। इसे बचाना भावी पीढ़ी के भविष्य की गारंटी है। वहीं इंटेक बाराँ चैप्टर के संयोजक जितेन्द्र कुमार शर्मा ने स्पष्ट किया कि आंदोलन का उद्देश्य विकास को रोकना नहीं है, बल्कि ऐसा पर्यावरण-हितैषी मॉडल सुनिश्चित करना है जिसमें प्रकृति, वन्यजीव और स्थानीय आजीविका सुरक्षित रहे।
धरोहरों की तरह संरक्षित हों प्राकृतिक संसाधन
पीपुल्स फॉर अरावलीज के बूंदी संयोजक विट्ठल सनाडय और सदस्य डॉ. अमित सिंह राठौड़ ने कहा कि ऐतिहासिक स्मारकों की तरह जंगल, पहाड़ और नदियां भी हमारी अमूल्य विरासत हैं। इन्हें केवल राजस्व या जमीन के आंकड़ों के तराजू पर नहीं तौला जाना चाहिए। चम्बल संसद संयोजक बृजेश विजयवर्गीय, लोक अधिकार मंच के संभागीय अध्यक्ष प्रमोद सोनी और दिलीप नावर ने कहा कि हाड़ौती की यह प्राकृतिक संपदा पूरे भौगोलिक क्षेत्र के पर्यावरण को प्रभावित करती है।
पर्यावरणविद् रॉबिन सिंह ने भी वैज्ञानिक मूल्यांकन और संवेदनशील प्रशासनिक दृष्टिकोण से संरक्षण की आवश्यकता बताई। प्रतिनिधिमंडल में प्रमुख पर्यावरण प्रेमियों और आंदोलनकारियों ने शाहाबाद के वनों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का संकल्प लिया।





