लेखक : परमानन्द गोयल, कोटा
एनसीसी केवल एक यूनिफॉर्म नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासन, एकता और राष्ट्र-सेवा के सूत्र में पिरोने की एक पाठशाला है। इसका ध्येय वाक्य ही है – “एकता और अनुशासन”। किशोरावस्था से युवावस्था तक का समय चरित्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण काल होता है, तब एनसीसी एक युवा को सही दिशा देती है।
एनसीसी क्या है?
नेशनल कैडेट कोर की स्थापना वर्ष 1948 में हुई थी। इसका उद्देश्य छात्र-छात्राओं में चरित्र, अनुशासन, नेतृत्व, धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण और निःस्वार्थ सेवा की भावना विकसित करना है। विद्यालय स्तर पर जूनियर डिवीजन और महाविद्यालय स्तर पर सीनियर डिवीजन के रूप में आर्मी, नेवी और एयर विंग के माध्यम से प्रशिक्षण दिया जाता है।
विद्यालय स्तर पर एनसीसी की उपादेयता –
विद्यालय स्तर वह नींव है जहाँ बच्चे में संस्कार पड़ते हैं। परेड, समय-पालन और यूनिफॉर्म का सम्मान बच्चे में अनुशासन को स्वभाव बना देता है तथा आत्मविश्वास बढ़ाता है। ड्रिल, पीटी, खेल और साहसिक गतिविधियाँ शरीर को स्वस्थ और मन को दृढ़ बनाती हैं और यहीं से सैन्य प्रशिक्षण की औपचारिक यात्रा शुरू होती है।
इसी संदर्भ में मेरा अपना अनुभव जुड़ा है। मैंने विद्यालय शिक्षा के दौरान एनसीसी के आर्मी विंग में कैडेट के रूप में भाग लिया और ‘ए’ सर्टिफिकेट उत्तीर्ण किया। वह पहला अवसर था जब यूनिफॉर्म पहन कर परेड करना, राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देना और अनुशासन जज्बा मन में पैदा हुआ।
महाविद्यालय स्तर पर एनसीसी की उपादेयता – व्यक्तित्व से नेतृत्व तक-
महाविद्यालय स्तर पर सीनियर डिवीजन एनसीसी केवल परेड तक सीमित नहीं रहती, यह नेतृत्व की प्रयोगशाला बन जाती है। सीनियर कैडेट के रूप में जूनियर्स को कमांड देना, कैंप का प्रबंधन करना और निर्णय लेना – ये सभी भविष्य के प्रबंधक और लीडर तैयार करते हैं। आर्मी विंग में फायरिंग, मैप रीडिंग, फील्ड क्राफ्ट तो एयर विंग में एयरो-मॉडलिंग, विमान के सिद्धांत, नेविगेशन और ग्लाइडिंग तथा फायरिंग जैसे दुर्लभ अवसर मिलते हैं। रक्तदान शिविर, स्वच्छता अभियान, आपदा प्रबंधन में सहयोग से राष्ट्र-सेवा और सामाजिक चेतना जागृत होती है।
मेरे लिए महाविद्यालय का कालखंड स्वर्णिम रहा। वर्ष 1977 से 1980 तक मैंने महाविद्यालय में एनसीसी के एयर विंग में सक्रिय भाग लिया और सार्जेंट रैंक पर रहते हुए सर्वोच्च ‘सी’ सर्टिफिकेट उत्तीर्ण किया।
मेरे अविस्मरणीय अनुभव – .303 राइफल से ग्लाइडर तक-
पॉइंट .303 राइफल चलाना और खास तौर पर सोलो ग्लाइडिंग का अनुभव आज भी स्मृति में ताजा है। उस समय .303 बोल्ट-एक्शन राइफल सेना और पुलिस का प्रमुख हथियार थी। एनसीसी में सर्विस राइफल व आधुनिक हथियारों को समझना और चलाना अपने आप में बड़ा प्रशिक्षण है।
एनसीसी दिवस और एक अविस्मरणीय सम्मान-
प्रति वर्ष नवंबर के चौथे रविवार को एनसीसी दिवस मनाया जाता है। इससे मेरा गौरवपूर्ण अनुभव जुड़ा है।
सत्र 1979-80 में मैंने अपनी प्रथम एकल उड़ान (Solo Gliding) सफलतापूर्वक सम्पन्न की। टू-सीटर ग्लाइडर में प्रशिक्षण और मापदंड पूरे होने के बाद प्रशिक्षक के बिना अकेले उड़ान भर कर सुरक्षित लैंडिंग कराना आत्मनिर्भरता की चरम परीक्षा होती है। इस उपलब्धि को उन दिनों कोटा के प्रमुख समाचार पत्रों ने प्रथम पृष्ठ पर स्थान दिया था।
इस उपलब्धि के फलस्वरूप वर्ष 1979 में एनसीसी दिवस पर महाराव उम्मेदसिंह स्टेडियम, कोटा में आयोजित समारोह में तत्कालीन क्षेत्रीय विकास आयुक्त आईएएस श्री आर.एस. कुम्भट द्वारा मुझे सिल्वर बैज (विंग्स) लगाकर सम्मानित किया गया।
इसी क्रम में मुझे The Aero Club of India, New Delhi द्वारा Federation Aeronautique Internationale (FAI) के मानकों पर ग्लाइडर पायलट लाइसेंस जारी किया जाना भी गौरव की बात रही। यद्यपि अब ग्लाइडर के स्थान पर माइक्रोलाइट से प्रशिक्षण दिया जाता है।
राष्ट्रीय कैंप और देश दर्शन-
वर्ष 1979 में मुझे ‘ऑल इंडिया वायु सैनिक कैंप’ में भाग लेने का अवसर मिला, जिसके तहत सरकारी खर्च पर बेंगलुरु और मद्रास जाने का अवसर मिला। इसके बाद एनसीसी की वजह से देहरादून तथा मसूरी जाने का भी अवसर मिला। यह एनसीसी का बड़ा लाभ है – नाममात्र के खर्च में देश के विभिन्न हिस्सों को देखना और राष्ट्रीय एकता को अनुभव करना।
‘सी’ सर्टिफिकेट के वास्तविक लाभ-
• भारतीय वायु सेना में चयन में विशेष अवसर।
• अनेक सरकारी नौकरियों में बोनस अंक और वरीयता।
• मुझे RPSC द्वारा विभिन्न सेवाओं में चयन के लिए पाँच बार साक्षात्कार का अवसर मिला, लगभग सभी में आधा समय एनसीसी पर ही केंद्रित रहा। लिखित परीक्षा और मेरिट का महत्व अपनी जगह है, पर यह स्पष्ट था कि सह-शैक्षणिक गतिविधियों में भागीदारी का उल्लेख करने पर साक्षात्कारकर्ताओं का ध्यान आकर्षित हुआ। खेलकूद और एनसीसी जैसी गतिविधियाँ साक्षात्कार में निर्णायक बढ़त देती हैं।
• स्टैमिना, सहनशक्ति में वृद्धि और अनुशासन जीवन का अभिन्न अंग बन जाता है।
एक भ्रांति का निवारण-
कई अभिभावक मानते हैं कि एनसीसी से समय बर्बाद होगा और बच्चा अंकों की दौड़ में पीछे रह जाएगा। वास्तविकता यह है कि माह में लगभग 20 घंटे, वर्ष में कुल 120 घंटे और लगभग 10 दिन अवकाश के दौरान कैम्प के लिए देना होता है। सही समय प्रबंधन से पढ़ाई पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
निष्कर्ष-
एनसीसी किशोर को नागरिक और नागरिक को राष्ट्र-भक्त बनाती है। मेरा दृढ़ मत है कि प्रत्येक विद्यालय और महाविद्यालय में एनसीसी को केवल वैकल्पिक गतिविधि नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण के अनिवार्य अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।
यूनिफॉर्म उतर जाती है, पर अनुशासन, नेतृत्व, समय प्रबंधन और देश-प्रेम जो एनसीसी सिखाती है, वह जीवन भर साथ रहता है।






