Tuesday, April 21, 2026
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ग़ज़ल-कब शजर* से टूटेंगे इन फलों को क्या मालूम है-शकूर अनवर

ग़ज़ल

शकूर अनवर

कब शजर* से टूटेंगे इन फलों को क्या मालूम।

कब कहाँ गिरे बिजली घोंसलों को क्या मालूम।।

*

सूखी सूखी फ़सलों की अपनी- अपनी क़िस्मत है।

किस ज़मीं पे बरसेंगे बादलों को क्या मालूम।।

*

रहबरो* की साज़िश से बेख़बर मुसाफ़िर हैं।

मंज़िलों की ख़ामोशी क़ाफ़लों को क्या मालूम।।

*

कर्ब* अपने अंदर का घुॅंघरुओं से ज़ाहिर* कर।

दिल में क्या ख़ुशी क्या ग़म पायलों को क्या मालूम।।

*

फ़र्ज़ अपनी मिट्टी का हमको ही समझना है।

कुछ बुरों से क्या पूछें कुछ भलों को क्या मालूम।।

*

हम थके चले ठहरे मंजिलें तो समझेंगी।

मरहले तो जामिद* हैं फ़ासलों को क्या मालूम।।

*

दिल पे मेरे गम क्यूं है सर पे ये सितम क्यूं है।

मेरी ऑंख नम क्यूँ है पागलों को क्या मालूम।।

*

किस क़दर वो नादाॅं ‌ हैं रोशनी समझते हैं।

जल गया चमन*”अनवर” दिल-जलों को क्या मालूम।।

*

शब्दार्थ:-

शजर* पेड़

रहबरों*रास्ता बताने वाले

कर्ब*दुख पीड़ा

ज़ाहिर कर*प्रकट कर

जामिद*स्थिर जड़

चमन*उपवन

शकूर अनवर

9460851271

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