Tuesday, April 21, 2026
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दहकता का अंगार (महाराणा प्रताप)-कवि* बृजेंद्र सिंह झाला ‘पुखराज’

दहकता अंगारा (महाराणा प्रताप)

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था ख़ोला रक्त धमनियों में,

भड़की श्वाँसों में चिंगारी ।

था ज़ोर विलक्षण बाज़ुओं में,

नस-नस में थी वो उजियारी ।।

उस अंगारे की लपटों से,

तमतमा उठी पावन माटी ।

जहाँ चेतक घोड़े पर प्रताप,

वह याद रहे हल्दी-घाटी ।।

बप्पा रावल के दीपक का,

इतिहास जहाँ के कण-कण में ।

जो अंधकार में रह कर भी,

एक बने प्रेरणा क्षण-क्षण में ।।

वह रौंद रहा कांटों को जिसकी,

अद्भुत बड़ी कहानी है ।

उमड़े रग़-रग़ में स्वाभिमान,

संकट ही पानी-पानी है ।।

इक क्षत्राणी का दुग्ध वही,

चित्तौड़ का अमिट उजाला है ।

जिसके फ़ौलादी पंजों में,

तलवार दुधारी-भाला है ।।

इक आन-मान के खातिर,

भीषण कष्टों से नित जूझा था ।

सर्वस्व समर्पित कर जिसने,

चन्दन-माटी को पूजा था ।।

हर कदम-कदम और मोड़-मोड़,

अनगिनत आपदा आई थी ।

परिवार सहित उस वीर ने जहाँ पर,

घास की रोटी खाई थी ।।

खेला प्राणों पर हरदम लेकिन,

हिम्मत कभी न हारी थी ।

अंगारे से चेहरे पर जिसके,

प्राणों की बलिहारी थी ।।

ऐसी थी वह एक विकट घड़ी,

बन एक चुनौती आई थी ।

दुश्मन ने आगे ही उसके,

उल्टे मुँह की खाई थी ।।

स्व-प्राण विसर्जन करते करते,

प्रतिद्वंद्वी पर फूट पड़ा ।

एक कड़कड़ाती बिजली बन वह,

घमासान में टूट पड़ा ।।

बलिवेदी की घनघोर घटा में,

महा-विजय का शंख बजा ।

ऐसे चिराग को पाने आखिर,

माता का निज अंक सजा ।।

ऐसा पल जीवन-दर्पण में जो,

कभी न देखा जा सकता ।

मरते दम तक जिसकी रूह से,

चित्तौड़ न भूला जा सकता ।।

जब बरस पड़े शत्रु के अश्रु,

थी कैसी उल्टी पाटी ।

जहाँ चेतक घोड़े पर प्रताप,

वह याद रहे हल्दी-घाटी ।।

था ख़ोला रक्त धमनियों में,

भड़की श्वाँसों में चिंगारी ।

था ज़ोर विलक्षण बाज़ुओं में,

नस-नस में थी वो उजियारी ।।

उस अंगारे की लपटों से,

तमतमा उठी पावन माटी ।

जहाँ चेतक घोड़े पर प्रताप,

वह याद रहे हल्दी-घाटी ।।

(स्वरचित/मौलिक/सर्वाधिकार सुरक्षित)

(रचनाकार: बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”,

कोटा (राजस्थान)

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