दहकता अंगारा (महाराणा प्रताप)
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था ख़ोला रक्त धमनियों में,
भड़की श्वाँसों में चिंगारी ।
था ज़ोर विलक्षण बाज़ुओं में,
नस-नस में थी वो उजियारी ।।
उस अंगारे की लपटों से,
तमतमा उठी पावन माटी ।
जहाँ चेतक घोड़े पर प्रताप,
वह याद रहे हल्दी-घाटी ।।
बप्पा रावल के दीपक का,
इतिहास जहाँ के कण-कण में ।
जो अंधकार में रह कर भी,
एक बने प्रेरणा क्षण-क्षण में ।।
वह रौंद रहा कांटों को जिसकी,
अद्भुत बड़ी कहानी है ।
उमड़े रग़-रग़ में स्वाभिमान,
संकट ही पानी-पानी है ।।
इक क्षत्राणी का दुग्ध वही,
चित्तौड़ का अमिट उजाला है ।
जिसके फ़ौलादी पंजों में,
तलवार दुधारी-भाला है ।।
इक आन-मान के खातिर,
भीषण कष्टों से नित जूझा था ।
सर्वस्व समर्पित कर जिसने,
चन्दन-माटी को पूजा था ।।
हर कदम-कदम और मोड़-मोड़,
अनगिनत आपदा आई थी ।
परिवार सहित उस वीर ने जहाँ पर,
घास की रोटी खाई थी ।।
खेला प्राणों पर हरदम लेकिन,
हिम्मत कभी न हारी थी ।
अंगारे से चेहरे पर जिसके,
प्राणों की बलिहारी थी ।।
ऐसी थी वह एक विकट घड़ी,
बन एक चुनौती आई थी ।
दुश्मन ने आगे ही उसके,
उल्टे मुँह की खाई थी ।।
स्व-प्राण विसर्जन करते करते,
प्रतिद्वंद्वी पर फूट पड़ा ।
एक कड़कड़ाती बिजली बन वह,
घमासान में टूट पड़ा ।।
बलिवेदी की घनघोर घटा में,
महा-विजय का शंख बजा ।
ऐसे चिराग को पाने आखिर,
माता का निज अंक सजा ।।
ऐसा पल जीवन-दर्पण में जो,
कभी न देखा जा सकता ।
मरते दम तक जिसकी रूह से,
चित्तौड़ न भूला जा सकता ।।
जब बरस पड़े शत्रु के अश्रु,
थी कैसी उल्टी पाटी ।
जहाँ चेतक घोड़े पर प्रताप,
वह याद रहे हल्दी-घाटी ।।
था ख़ोला रक्त धमनियों में,
भड़की श्वाँसों में चिंगारी ।
था ज़ोर विलक्षण बाज़ुओं में,
नस-नस में थी वो उजियारी ।।
उस अंगारे की लपटों से,
तमतमा उठी पावन माटी ।
जहाँ चेतक घोड़े पर प्रताप,
वह याद रहे हल्दी-घाटी ।।
(स्वरचित/मौलिक/सर्वाधिकार सुरक्षित)
(रचनाकार: बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”,
कोटा (राजस्थान)
दहकता का अंगार (महाराणा प्रताप)-कवि* बृजेंद्र सिंह झाला ‘पुखराज’





