ज्योतिषाचार्य पूरन सोनी✍️
कोटा। अयोध्यापुरी स्थित पंजाबी धर्मशाला में श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ धार्मिक एवं भक्तिमय वातावरण में हुआ। कथा के शुभारंभ से पूर्व महिलाओं ने मंगल कलशयात्रा निकाली। महिलाओं ने सिर पर मंगल कलश धारण कर कलशयात्रा में भाग लिया। श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हुए और भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे लगाते हुए कथास्थल तक पहुंचे। पूरे मार्ग में भक्तिमय वातावरण बना रहा।
कलशयात्रा के माध्यम से श्रद्धालुओं की श्रीमद्भागवत कथा और सनातन संस्कृति के प्रति आस्था एवं समर्पण दिखाई दिया। कथास्थल पर श्रद्धालु भजनों और भगवान के जयकारों में भावविभोर नजर आए।
कथा के प्रथम दिन आचार्य कृष्णकांत शर्मा बृजवासी ने श्रीमद्भागवत कथा के महात्म्य का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भागवत केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा देने वाला आध्यात्मिक मार्गदर्शक है। इसके श्रवण से मनुष्य के जीवन में ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का विकास होता है तथा उसे अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध होता है।
आचार्य ने कहा कि सच्ची भक्ति से मनुष्य का अंतर्मन शुद्ध होता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है। सत्संग एवं कथा-श्रवण से भक्ति का भाव मजबूत होता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यस्त जीवन में कुछ समय भगवान की कथा और सत्संग के लिए अवश्य निकालना चाहिए। उन्होंने धर्म, भक्ति, सदाचार और अच्छे कर्मों के महत्व पर भी प्रकाश डाला तथा निरंतर भगवान का स्मरण करने का संदेश दिया।
अयोध्यापुरी स्थित पंजाबी धर्मशाला में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए पहुंचे। कथावाचन करते हुए आचार्य कृष्णकांत शर्मा बृजवासी ने भगवान की भक्ति और श्रद्धा का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि हृदय से की गई सच्ची पुकार भगवान तक अवश्य पहुंचती है और भगवान अपने भक्त की पुकार पर अवश्य आते हैं।
कथा के दौरान आचार्य ने भीष्म पितामह का भगवद् धाम गमन, उत्तरा के गर्भ की ब्रह्मास्त्र से रक्षा, परीक्षित जन्म तथा राजा परीक्षित को ऋषि के शाप मिलने की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में प्रवेश कर ब्रह्मास्त्र से अजन्मे परीक्षित की रक्षा की। इसी कारण परीक्षित के जीवन में प्रारंभ से ही भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति के संस्कार रहे।
आचार्य कृष्णकांत शर्मा ने कहा कि कलियुग के प्रभाव में मनुष्य जाने-अनजाने संतों और वैष्णवों का अपराध कर बैठता है। इससे सदैव सावधान रहना चाहिए। संतों और वैष्णवों के प्रति सम्मान, विनम्रता और सद्भाव बनाए रखना आध्यात्मिक जीवन के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपनी वाणी, व्यवहार और विचारों में विनम्रता रखनी चाहिए।
राजा परीक्षित के प्रसंग का वर्णन करते हुए आचार्य ने बताया कि जब उन्हें ऋषि के शाप के कारण अपने जीवन के कुछ ही दिन शेष रहने का पता चला, तो उन्होंने राजपाट और सांसारिक मोह-माया से मन हटा लिया। वे शुकतालधाम में गंगा के पावन तट पर वट वृक्ष के नीचे बैठ गए और अपना मन भगवान की भक्ति में लगा दिया।
उन्होंने कहा कि भगवान को हृदय से पुकारने का संस्कार राजा परीक्षित को बचपन से मिला था। उन्हें शिक्षा दी गई थी कि जीवन में संकट आने पर घबराने के बजाय सच्चे हृदय से भगवान का स्मरण करना चाहिए। परीक्षित की श्रद्धा और भक्ति के कारण अनेक महात्मा उनके पास पहुंचे और बाद में शुकदेवजी ने उन्हें श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कराया।
कथा के तृतीय दिवस शुक्रवार को ध्रुवजी का चरित्र, अजामिल चरित्र, कपिल-देवहूति संवाद, जड़ भरतजी का चरित्र तथा श्रीप्रह्लादजी की कथा का विस्तार से वर्णन किया जाएगा।
श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन 25 अगस्त तक प्रतिदिन दोपहर 12:15 बजे से शाम 4:15 बजे तक अयोध्यापुरी पंजाबी धर्मशाला में किया जा रहा है।






