कोटा के स्वतंत्रता सेनानी मिस्त्री अब्दुल्ला गांधी : सस्ता अनाज और कोटा को राजधानी बनाने की लड़ाई में समर्पित जीवन
कोटा। आजादी के बाद देश के सामने राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आम आदमी के सामने रोटी और रोजमर्रा की जरूरतों का संकट भी एक बड़ी चुनौती था। रियासतों के एकीकरण के दौर में कोटा भी राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल था। इसी दौर से जुड़ा एक नाम है—स्वतंत्रता सेनानी मिस्त्री अब्दुल्ला गांधी।
स्थानीय इतिहास में मिस्त्री अब्दुल्ला गांधी को ऐसे जनसेवक के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने आम जनता के हितों के लिए आवाज उठाई। स्थानीय परंपरा और उपलब्ध स्मृति-सामग्री के अनुसार, आजादी के बाद जब अनाज के दाम में अचानक बढ़ोतरी हुई और गरीब तथा मध्यम वर्ग के सामने खाद्यान्न का संकट खड़ा हुआ, तब उन्होंने जनता को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने की मांग को लेकर आंदोलन का नेतृत्व किया।
सस्ता अनाज दिलाने के लिए सत्याग्रह
स्थानीय इतिहास के अनुसार, उस समय अनाज के दाम में बढ़ोतरी को लेकर आम लोगों में भारी असंतोष था। बताया जाता है कि अनाज की कीमत 20 पैसे प्रति किलो से बढ़कर 50 पैसे प्रति किलो तक पहुंच गई थी। महंगाई की इस स्थिति में गरीब परिवारों के लिए घर चलाना मुश्किल हो रहा था।
मिस्त्री अब्दुल्ला गांधी ने जनता की इस समस्या को आंदोलन का मुद्दा बनाया। उनके नेतृत्व में सस्ता अनाज उपलब्ध कराने की मांग को लेकर सत्याग्रह आंदोलन चलाया गया। इस आंदोलन का उद्देश्य केवल राजनीतिक सत्ता में भागीदारी नहीं, बल्कि आम नागरिक को उसकी मूलभूत जरूरत—रोटी—उपलब्ध कराना भी था।
कोटा को राजस्थान की राजधानी बनाने की मांग
मिस्त्री अब्दुल्ला गांधी से जुड़ी स्थानीय स्मृतियों में एक अन्य महत्वपूर्ण प्रसंग कोटा को राजस्थान की राजधानी बनाए जाने की मांग का है।
यह तथ्य ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है कि 25 मार्च 1948 को पूर्व राजस्थान संघ का गठन हुआ और उसकी राजधानी कोटा बनाई गई। इस संघ में कोटा सहित नौ रियासतें शामिल थीं। कोटा के महाराव भीमसिंह राजप्रमुख और शाहपुरा के गोकुललाल असावा प्रधानमंत्री बने।
इस प्रकार 1948 में कोटा वास्तव में राजस्थान के राजनीतिक पुनर्गठन के एक महत्वपूर्ण चरण में राजधानी बना था। हालांकि कुछ ही समय बाद मेवाड़ के सम्मिलित होने के बाद राजनीतिक व्यवस्था बदली और राजधानी उदयपुर हो गई।
इस ऐतिहासिक घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि कोटा को राजधानी बनाने का सवाल उस समय केवल स्थानीय भावना नहीं था, बल्कि राजस्थान के एकीकरण की व्यापक राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा था।
प्रजामंडल आंदोलन की पृष्ठभूमि
कोटा में प्रजामंडल आंदोलन का इतिहास इससे भी पहले शुरू हो चुका था। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, 1938-39 के दौर में कोटा राज्य प्रजामंडल का गठन हुआ और नयनूराम शर्मा इसके प्रमुख नेताओं में रहे। 1939 में मांगरोळ में प्रजामंडल का अधिवेशन हुआ और बाद में अभिन्न हरि ने इसके नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कोटा में जनआंदोलन ने व्यापक रूप लिया। जनता ने कोटा की शहर कोतवाली पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया और कुछ समय के लिए नगर प्रशासन पर भी जनता का प्रभाव स्थापित हुआ।
इससे स्पष्ट होता है कि कोटा में स्वतंत्रता आंदोलन केवल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष तक सीमित नहीं था, बल्कि उत्तरदायी शासन, जन अधिकार और आम जनता की समस्याओं से भी जुड़ा हुआ था।
मिस्त्री के हुनर से बनी अलग पहचान
स्थानीय स्मृतियों में मिस्त्री अब्दुल्ला गांधी की पहचान एक कुशल कारीगर के रूप में भी मिलती है। बताया जाता है कि वे दरबारी एवं सरकारी गढ़ाई/धातु-कर्म से जुड़े काम करते थे। स्थानीय परंपरा के अनुसार पुलिस तथा नगर निकाय से संबंधित धातु के बैज और अन्य सामान बनाने में भी उनकी भूमिका रही।
उनकी पहचान केवल एक कारीगर के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्ति के रूप में बनी। उनके व्यक्तित्व में कारीगरी, सामाजिक सरोकार और राजनीतिक चेतना का अनूठा मेल दिखाई देता है।
20 अगस्त 1948 : संघर्ष का अंतिम पड़ाव
स्थानीय ऐतिहासिक स्मृति के अनुसार, सस्ता अनाज और कोटा को राजधानी बनाए रखने की मांग को लेकर चलाए गए सत्याग्रही आंदोलन के दौरान मिस्त्री अब्दुल्ला गांधी अस्वस्थ हो गए। बताया जाता है कि इलाज के दौरान 20 अगस्त 1948 को शाम लगभग 4:45 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
उनकी मृत्यु को स्थानीय लोग स्वतंत्रता के बाद जनता के अधिकारों और हितों के लिए किए गए संघर्ष में बलिदान के रूप में याद करते हैं।
अनाज कटला स्थित स्मारक आज भी याद दिलाता है उनका संघर्ष
कोटा के पुराने व्यापारिक क्षेत्र में स्थित अनाज कटला का ऐतिहासिक महत्व भी इस कहानी से जुड़ता है। स्थानीय जानकारी के अनुसार यह क्षेत्र पुरानी अनाज मंडी के रूप में जाना जाता था और यहीं घंटाघर क्षेत्र में मिस्त्री अब्दुल्ला गांधी की स्मृति में स्मारक स्थापित है।
आज जब नई पीढ़ी कोटा के आधुनिक स्वरूप को देखती है, तब शहर के पुराने बाजारों और स्मारकों में छिपी ऐसी कहानियां उसे उस दौर की याद दिलाती हैं, जब स्वतंत्रता के बाद भी आम आदमी के अधिकारों, भोजन और राजनीतिक व्यवस्था के लिए संघर्ष जारी था।
इतिहास को दस्तावेजों में सुरक्षित करने की जरूरत
मिस्त्री अब्दुल्ला गांधी का जीवन कोटा के स्थानीय इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। उनके संबंध में प्रचलित मौखिक परंपराओं और स्मारक से जुड़ी जानकारी को यदि तत्कालीन सरकारी दस्तावेजों, अखबारों, प्रजामंडल के अभिलेखों और परिवार के पास उपलब्ध रिकॉर्ड से जोड़ा जाए, तो कोटा के स्वतंत्रता आंदोलन का यह अपेक्षाकृत कम चर्चित अध्याय अधिक प्रमाणिक रूप से सामने आ सकता है।
इतिहास केवल बड़े नेताओं और प्रसिद्ध आंदोलनों का नाम नहीं है। इतिहास उन स्थानीय लोगों के संघर्षों से भी बनता है, जिन्होंने आम जनता की रोटी, अधिकार और सम्मान के लिए आवाज उठाई।
मिस्त्री अब्दुल्ला गांधी की स्मृति इसी संघर्ष की एक स्थानीय विरासत है—जिसे आने वाली पीढ़ियों तक तथ्य और दस्तावेज के साथ पहुंचाना जरूरी है।





















