Friday, October 2, 2026
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कोटा में 58 साल की परंपरा: तीज माता की सवारी से 15 दिन के मेले तक पहुंचा स्टेशन क्षेत्र का आयोजन

58 साल की परंपरा: तीज माता की सवारी से 15 दिन के मेले तक पहुंचा स्टेशन क्षेत्र का आयोजन

कोटा। स्टेशन क्षेत्र में करीब 58 साल पहले शुरू हुई तीज माता की सवारी आज एक बड़े मेले का रूप ले चुकी है। मस्जिद गली से शुरू हुई यह परंपरा अब लगभग 15 दिन तक चलने वाले मेले में बदल गई है। मेले में राजस्थान सहित प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से व्यापारी पहुंचते हैं और 200 से अधिक दुकानें सजती हैं। समय के साथ इस मेले ने अपनी अलग पहचान बना ली है।

इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि मेले के लिए नगर निगम या शहर प्रशासन की ओर से कोई विशेष योगदान नहीं दिया जाता। भरावा परिवार तीन पीढ़ियों से स्थानीय लोगों के सहयोग से पूरे आयोजन की व्यवस्थाएं संभाल रहा है। हरियाली तीज से करीब एक माह पहले ही परिवार में तैयारियां शुरू हो जाती हैं और घर में उत्सवी माहौल बन जाता है। परिवार के सदस्य अपने व्यवसाय के बजाय मेले की तैयारियों और व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हैं।

58 साल पहले निकली थी तीज माता की सवारी

भरावा परिवार के अनुसार करीब 58 वर्ष पहले स्टेशन क्षेत्र की मस्जिद गली में रहने वाले नंदकिशोर भरावा ने तीज माता की शोभायात्रा निकालने की परंपरा शुरू की थी। शुरुआत में यह आयोजन तीन दिन का था, जो समय के साथ बढ़कर करीब 15 दिन के मेले में बदल गया। आज मेले में 200 से अधिक दुकानें लगती हैं और दूर-दूर से व्यापारी यहां पहुंचते हैं।

तीज माता की झांकी के दर्शन और शोभायात्रा में क्षेत्र सहित आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में महिला-पुरुष शामिल होते हैं। मेले की लोकप्रियता लगातार बढ़ने के साथ यह आयोजन स्टेशन क्षेत्र की प्रमुख लोक परंपराओं में अपनी पहचान बना चुका है।

तीन पीढ़ियों से भरावा परिवार संभाल रहा जिम्मेदारी

नंदकिशोर भरावा के पौत्र और परपौत्र अब मेले की व्यवस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। समय के साथ मेले के आयोजक और कार्यक्रमों का स्वरूप भी बदलता रहा।

भरावा परिवार के अनुसार वर्ष 1988 में नंदकिशोर भरावा ने आयोजन की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद उनके बेटे भंवरलाल भरावा ने व्यवस्थाएं देखनी शुरू कीं। वर्ष 1983 में उनके निधन के बाद बंसत भरावा और उनके भतीजे श्याम भरावा ने आयोजन की कमान संभाली और इसे आगे बढ़ाया। परिवार की कई पीढ़ियां आज भी स्थानीय लोगों के सहयोग से इस परंपरा को जीवित रखने में जुटी हैं।

पहले होते थे कवि सम्मेलन और सांस्कृतिक कार्यक्रम

मेले के शुरुआती दौर में यहां कवि सम्मेलन सहित प्रतिदिन विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। हालांकि समय के साथ बजट और संसाधनों की कमी के कारण इन कार्यक्रमों का आयोजन बंद हो गया। इसके बावजूद आयोजक हाड़ौती की लोक परंपराओं और संस्कृति को जीवित रखने के प्रयास में हर वर्ष लोक कलाकारों को मेले में प्रस्तुति के लिए आमंत्रित करते हैं।

भरावा परिवार का कहना है कि उनके बुजुर्गों ने जिस परंपरा की शुरुआत की थी, उसे आज भी पूरी श्रद्धा और स्थानीय लोगों के सहयोग से आगे बढ़ाया जा रहा है। तीज माता की सवारी से शुरू हुई यह परंपरा अब न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि स्टेशन क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और लोक परंपरा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।

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