Friday, August 14, 2026
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128 साल पुराना कोटा का ऐतिहासिक बैंड स्टैंड फिर होगा गुलजार

आजादी की पूर्व संध्या पर हाड़ौती के कलाकारों और आर्मी बैंड की प्रस्तुतियों से गूंजेगा रियासतकालीन बैंड स्टैंड

कोटा। कभी राजसी आयोजनों, शाही मेहमानों और मशक बैंड यानी बैगपाइपर की मधुर धुनों से गुलजार रहने वाला कोटा का करीब 128 साल पुराना ऐतिहासिक बैंड स्टैंड अब एक बार फिर संगीत से जीवंत होने जा रहा है। लंबे समय से उपेक्षा और बदहाली का सामना कर रही इस ऐतिहासिक धरोहर को श्री उम्मेद क्लब ने पुनर्जीवित करने की पहल की है।

आजादी की पूर्व संध्या पर ऐतिहासिक बैंड स्टैंड परिसर में हाड़ौती के स्थानीय कलाकारों के साथ आर्मी बैंड की विशेष प्रस्तुतियां आयोजित की जाएंगी। इस आयोजन के जरिए न केवल संगीत की पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित किया जाएगा, बल्कि शहरवासियों और नई पीढ़ी को कोटा की रियासतकालीन विरासत से परिचित कराने का प्रयास भी किया जाएगा।

उपेक्षा के लंबे दौर के बाद फिर लौटेगी रौनक

श्री उम्मेद क्लब के महासचिव लोकेन्द्र सिंह राजावत के अनुसार क्लब परिसर में मौजूद यह बैंड स्टैंड लंबे समय से उपेक्षित और बदहाल स्थिति में था। देखने में यह एक सामान्य चबूतरे जैसा प्रतीत होता था, लेकिन कोटा हेरिटेज वॉक, इंटेक और शहर के इतिहासकारों के प्रयासों से इसके ऐतिहासिक महत्व की जानकारी सामने आई।

इतिहास से जुड़े दस्तावेजों और स्थानीय शोध के आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि यह कोई साधारण निर्माण नहीं, बल्कि कोटा रियासत के दौर का बैंड स्टैंड है। यहां कभी राजसी कार्यक्रमों के दौरान मशक बैंड की प्रस्तुतियां हुआ करती थीं।

श्री उम्मेद क्लब प्रबंधन ने इस ऐतिहासिक स्थल की महत्ता को समझते हुए इसे फिर से जीवंत करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। उद्देश्य सिर्फ बैंड स्टैंड की भौतिक स्थिति सुधारना नहीं, बल्कि उससे जुड़ी संगीत, संस्कृति, राजसी परंपरा और सामाजिक जीवन की स्मृतियों को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।

कभी मशक बैंड की धुनों से गूंजता था परिसर

रियासतकाल में संगीत राजसी आयोजनों का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था। जब महाराव अपने अधिकारियों, जागीरदारों और अन्य विशिष्ट लोगों के साथ क्रॉस्थवेट इंस्टीट्यूट पहुंचते थे, तब बैंड स्टैंड से मशक बैंड यानी बैगपाइपर की धुनें वातावरण में गूंजती थीं।

मशक बैंड की विशेष धुनों के साथ राजसी वातावरण और अधिक भव्य हो जाता था। उस दौर में बैंड स्टैंड केवल कलाकारों के खड़े होकर संगीत प्रस्तुत करने का स्थान नहीं था, बल्कि यह राजसी समारोहों और सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

समय बदला, रियासतों का दौर समाप्त हुआ और धीरे-धीरे इस स्थान की उपयोगिता भी कम होती चली गई। करीब सात दशक से अधिक समय तक उपेक्षा के बाद अब इसे फिर से सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

1896 से जुड़ी है इस धरोहर की कहानी

इस ऐतिहासिक बैंड स्टैंड की कहानी कोटा के रियासतकालीन इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना से जुड़ी हुई है।

उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण के अनुसार वर्ष 1896 में इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया ने कोटा महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय को शासन के पूर्ण अधिकार प्रदान किए थे। महारानी का फरमान राजपूताना के तत्कालीन एजीजी सर रॉबर्ट क्रॉस्थवेट कोटा लेकर आए थे।

यह कोटा रियासत के लिए महत्वपूर्ण अवसर था। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में 5 दिसंबर 1896 को कोटा गढ़ में एक विशेष जलसा आयोजित किया गया। इसके बाद सर रॉबर्ट क्रॉस्थवेट के सम्मान में कोटा के बाग क्षेत्र में एक भवन बनाने की घोषणा की गई।

इस भवन का नाम क्रॉस्थवेट इंस्टीट्यूट रखा गया।

26 जनवरी 1898 को रखी गई थी नींव

क्रॉस्थवेट इंस्टीट्यूट की नींव 26 जनवरी 1898 को स्वयं सर रॉबर्ट क्रॉस्थवेट ने रखी थी। भवन का डिजाइन कोटा रियासत के तत्कालीन स्टेट इंजीनियर आर.एच. टिकेल ने तैयार किया था।

इसी स्थापत्य योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था वहां बनाया गया विशेष बैंड स्टैंड।

भवन के समीप एक विशाल और कलात्मक चबूतरे का निर्माण किया गया, जहां राजसी अवसरों पर संगीत की प्रस्तुतियां होती थीं। यही स्थान आगे चलकर कोटा के रियासतकालीन सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

सिर्फ चबूतरा नहीं, इतिहास की जीवंत कड़ी

आज यह बैंड स्टैंड पहली नजर में भले ही एक सामान्य पुराना चबूतरा दिखाई दे, लेकिन इसके पीछे कोटा के करीब सवा सौ साल से अधिक पुराने इतिहास की कहानी छिपी हुई है।

यह स्थल उस दौर की याद दिलाता है जब कोटा में राजसी आयोजनों के साथ संगीत, स्थापत्य और सामाजिक परंपराएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं। यहां बजने वाली मशक बैंड की धुनें केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थीं, बल्कि वे तत्कालीन राजसी वातावरण और समारोहों की पहचान भी थीं।

इसी वजह से इतिहासविदों और विरासत संरक्षण से जुड़े लोगों का मानना है कि ऐसी धरोहरों को केवल पुरानी इमारत या चबूतरे के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इनके पीछे छिपी कहानियों, परंपराओं और सांस्कृतिक संदर्भों को संरक्षित करना भी उतना ही जरूरी है।

हाड़ौती के कलाकार और आर्मी बैंड देंगे प्रस्तुति

आजादी की पूर्व संध्या पर प्रस्तावित कार्यक्रम इसी ऐतिहासिक विरासत को वर्तमान से जोड़ने की कोशिश है। कार्यक्रम में हाड़ौती के कलाकारों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ आर्मी बैंड भी अपनी प्रस्तुति देगा।

इससे करीब सात दशक से अधिक समय बाद ऐतिहासिक बैंड स्टैंड पर फिर संगीत की गूंज सुनाई देगी। आयोजन को लेकर क्लब सदस्यों और शहर के विरासत प्रेमियों में उत्साह है।

पर्यटकों के लिए बन सकता है आकर्षण

श्री उम्मेद क्लब प्रबंधन का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक बैंड स्टैंड का व्यवस्थित संरक्षण और विकास किया जाए तो आने वाले समय में इसे कोटा के हेरिटेज टूरिज्म सर्किट से जोड़ा जा सकता है।

कोटा आने वाले पर्यटक चंबल, ऐतिहासिक किलों और अन्य विरासत स्थलों के साथ ऐसे छोटे लेकिन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों को भी देख सकेंगे। इससे शहर की विरासत को एक व्यापक संदर्भ में समझने का अवसर मिलेगा।

विरासत संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास

इतिहासविद् फिरोज अहमद, कोटा हेरिटेज वॉक के सर्वेश सिंह, इंटेक कोटा के कन्वीनर निखिलेश सेठी और श्री उम्मेद क्लब के उपाध्यक्ष अजय खत्री सहित क्लब और विरासत प्रेमियों का मानना है कि कोटा की ऐसी धरोहरों का संरक्षण समय की आवश्यकता है।

इस प्रयास में आरडी मीणा, डॉ. विजय सरदाना, मनीष धारिवर, सुधाकर बहेड़िया, कपिल जैन, अलौकिक जैन, कमल दीप, कुलदीप माथुर, कपिल अरोड़ा और गगन जैन सहित क्लब के अनेक सदस्यों ने भी योगदान दिया है।

इन सभी का मानना है कि विरासत संरक्षण का मतलब केवल पुरानी इमारतों को बचाकर रखना नहीं है। असली संरक्षण तब होगा, जब इन धरोहरों से जुड़ी कहानियां, संगीत, संस्कृति, परंपराएं और शहर के सामाजिक जीवन की स्मृतियां भी अगली पीढ़ी तक पहुंचें।

इतिहास से वर्तमान तक एक नई शुरुआत

करीब 128 वर्ष पुराना यह बैंड स्टैंड अब अपने अतीत की ओर लौटने की तैयारी में है। कभी जहां राजसी आयोजनों में मशक बैंड की धुनें गूंजती थीं, वहीं अब स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हाड़ौती की लोक संस्कृति और आर्मी बैंड की प्रस्तुतियां सुनाई देंगी।

यह पहल कोटा की विरासत के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है—इतिहास केवल किताबों और संग्रहालयों में सुरक्षित नहीं रहता, बल्कि जब पुरानी परंपराएं फिर से जीवंत होती हैं, तब इतिहास वर्तमान से संवाद करने लगता है।

कोटा का यह ऐतिहासिक बैंड स्टैंड उसी संवाद की एक नई शुरुआत का गवाह बनने जा रहा है।

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