Friday, August 14, 2026
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हाड़ौती के क्रांतिकारी इतिहास की अनूठी गाथा

कोटा/हाड़ौती। राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल बड़े राजनीतिक केंद्रों और प्रसिद्ध नेताओं तक सीमित नहीं है। हाड़ौती की धरती—कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़—ने भी अंग्रेजी सत्ता तथा रियासती निरंकुशता के विरुद्ध संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां सैनिकों, किसानों, विद्यार्थियों, साहित्यकारों, महिलाओं और प्रजामंडल कार्यकर्ताओं ने अलग-अलग दौर में जनचेतना को मजबूत किया।

हाड़ौती के इतिहास की कुछ घटनाएं ऐसी हैं, जिनमें स्थानीय जनता ने केवल विरोध प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि शासन की सत्ता को सीधे चुनौती दी। इनमें 1857 का कोटा विद्रोह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान रामपुरा कोतवाली का घटनाक्रम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

1857 : जब कोटा में विद्रोह ने लिया जनआंदोलन का रूप

1857 का विद्रोह राजस्थान के कई हिस्सों में फैला, लेकिन कोटा की घटना अपने स्वरूप के कारण अलग पहचान रखती है। यहां विद्रोह केवल सैनिकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़ी संख्या में आम नागरिक भी इसमें शामिल हुए।

15 अक्टूबर 1857 को कोटा में विद्रोहियों ने ब्रिटिश राजनीतिक एजेंट मेजर चार्ल्स बर्टन के निवास पर हमला किया। बर्टन और उनके दो पुत्रों की हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद विद्रोह तेजी से फैल गया। कोटा विद्रोह का नेतृत्व मुख्य रूप से लाला जयदयाल और मेहराब खान ने किया। राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड की आधिकारिक परीक्षा सामग्री में भी कोटा के 1857 के विद्रोह के नेताओं के रूप में लाला जयदयाल और मेहराब खान का उल्लेख मिलता है।

जनरल रॉबर्ट्स की सेना और कोटा की निर्णायक लड़ाई

विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजी सेना ने कोटा की ओर कूच किया। जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने मार्च 1858 में कोटा पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने के लिए सैन्य कार्रवाई की। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि कोटा में विद्रोही नियंत्रण को समाप्त करने की कार्रवाई मार्च 1858 में हुई और इसके बाद ब्रिटिश सत्ता ने नगर पर पुनः अधिकार स्थापित किया।

कैथूनीपोल सहित शहर के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष हुआ। लाला जयदयाल और मेहराब खान जैसे नेताओं के संघर्ष का उल्लेख राजस्थान के 1857 संबंधी ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है।

स्थानीय इतिहासकारों द्वारा इस संघर्ष से जुड़ी तोपों, बारूदखानों और घास की बागड़ पर हुई कार्रवाई के कई विवरण बताए जाते हैं। हालांकि इन घटनाओं के हर विशिष्ट विवरण के लिए स्वतंत्र प्राथमिक अभिलेख उपलब्ध न होने के कारण उन्हें निश्चित तथ्य की बजाय स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है।

नयनूराम शर्मा : हाड़ौती में राजनीतिक चेतना के प्रमुख सूत्रधार

हाड़ौती के स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा पं. नयनूराम शर्मा के बिना अधूरी है।

नयनूराम शर्मा का संबंध रामगंजमंडी क्षेत्र के निमाणा गांव से था। उन्होंने कोटा राज्य की पुलिस सेवा में कार्य किया, लेकिन बाद में सरकारी सेवा छोड़कर स्वतंत्रता और जनजागरण के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उपलब्ध जीवन-वृत्तांतों में उनके राजस्थान सेवा संघ से जुड़ने और हाड़ौती क्षेत्र में जनचेतना फैलाने का उल्लेख मिलता है।

राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की उपलब्ध पाठ्य सामग्री में 1934 में हाड़ौती प्रजामंडल की स्थापना का श्रेय पं. नयनूराम शर्मा को दिया गया है। इसके बाद कोटा राज्य प्रजामंडल का संगठन विकसित हुआ, जिसमें नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि और अन्य कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कोटा राज्य प्रजामंडल का पहला अधिवेशन 1939 में मांगरोल में नयनूराम शर्मा की अध्यक्षता में हुआ था।

प्रजामंडल का मूल उद्देश्य जनता के राजनीतिक अधिकारों, उत्तरदायी शासन और जनहित के मुद्दों को सामने लाना था।

किसान आंदोलनों से भी जुड़ा था नयनूराम शर्मा का संघर्ष-

नयनूराम शर्मा केवल राजनीतिक संगठनकर्ता नहीं थे। उन्होंने किसान आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

राजस्थान सरकार के सुजस प्रकाशन में बूंदी के बरड़ किसान आंदोलन के संदर्भ में नयनूराम शर्मा के नेतृत्व का उल्लेख मिलता है। इस आंदोलन के माध्यम से किसानों के प्रश्नों को व्यापक राजनीतिक आंदोलन से जोड़ने का प्रयास हुआ।

उनकी गतिविधियों का प्रभाव हाड़ौती के ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचा। यही कारण है कि उन्हें कोटा राज्य में जनजागृति के प्रमुख नेताओं में गिना जाता है।

नयनूराम शर्मा की हत्या

नयनूराम शर्मा की राजनीतिक सक्रियता का अंत अत्यंत दुखद घटना के साथ हुआ।

उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 14 अक्टूबर 1941 को उनकी हत्या कर दी गई। उनकी मृत्यु के बाद कोटा प्रजामंडल का नेतृत्व पं. अभिन्न हरि सहित अन्य नेताओं ने संभाला।

उनकी हत्या 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से ठीक पहले हुई थी। इसलिए उनके द्वारा तैयार की गई राजनीतिक चेतना और संगठनात्मक आधार बाद के आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बना।

सूर्यमल्ल मिश्रण : कलम से क्रांति की चेतना

हाड़ौती की स्वतंत्रता चेतना केवल राजनीतिक आंदोलनों से नहीं बनी। साहित्य ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बूंदी के महान कवि सूर्यमल्ल मिश्रण का नाम इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। उनका जन्म 1815 में बूंदी क्षेत्र के हरणा गांव में हुआ था। वे बूंदी दरबार से जुड़े महान डिंगल कवि थे और उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘वंश भास्कर’ और ‘वीर सतसई’ शामिल हैं।

1857 के विद्रोह के समय उनकी रचनाओं में वीरता, स्वाभिमान और विदेशी सत्ता के विरोध की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। ‘वीर सतसई’ को राजस्थान के स्वतंत्रता चेतना संबंधी साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है। इसमें 1857 की क्रांति से संबंधित भाव और वीरता का आह्वान मिलता है।

सूर्यमल्ल मिश्रण की भूमिका को इस अर्थ में समझना चाहिए कि उन्होंने शस्त्र उठाने के बजाय साहित्य और पत्राचार के माध्यम से राजनीतिक और राष्ट्रीय चेतना को स्वर दिया।

नगेन्द्र बाला और योगेन्द्र बाला : स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी

हाड़ौती के स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी महिलाओं की भागीदारी के बिना पूरी नहीं होती।

ठाकुर केसरीसिंह बारहठ के परिवार की नगेन्द्र बाला का नाम कोटा के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण है। उपलब्ध चारण साहित्य संबंधी स्रोत के अनुसार नगेन्द्र बाला का जन्म 1926 में कोटा के माणिक भवन में हुआ था और वे केसरीसिंह बारहठ की पौत्री थीं। उनकी बहन योगेन्द्र बाला के साथ उनका सार्वजनिक जीवन में सक्रिय योगदान रहा।

नगेन्द्र बाला और योगेन्द्र बाला के संबंध में पर्चे बांटने, छात्राओं और जनसभाओं के माध्यम से स्वतंत्रता की चेतना फैलाने जैसी बातें स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में मिलती हैं। लेकिन इन विवरणों के सभी हिस्सों की स्वतंत्र प्राथमिक अभिलेखों से पुष्टि नहीं मिलती।  “उपलब्ध स्थानीय विवरणों के अनुसार”

यह तथ्य प्रमाणित रूप से उपलब्ध है कि नगेन्द्र बाला ने 1947 के जयपुर कांग्रेस अधिवेशन में अपनी बहन योगेन्द्र बाला के साथ स्वयंसेवक व्यवस्था में भाग लिया था।

बोरखंडी पुल : 1818 की विरासत और इतिहास का एक रोचक विवाद

कोटा के बाहरी क्षेत्र में स्थित बोरखंडी का पुराना पुल हाड़ौती की स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

उपलब्ध विरासत सामग्री के अनुसार यह पुराना पुल 1818 के आसपास का है और आज के आधुनिक पुल के नीचे स्थित ऐतिहासिक संरचना के रूप में जाना जाता है।

इस पुल से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पहलू इसके निर्माणकर्ता को लेकर है।

पुल पर लगे बाद के शिलालेखों में इसे लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स टॉड, तत्कालीन पॉलिटिकल एजेंट से जोड़ा गया है। शिलालेख में यह भी कहा गया है कि पुल का निर्माण पिंडारियों से प्राप्त लूट की रकम से हुआ था।

ब्रिटिश लाइब्रेरी के अभिलेख में संरक्षित लगभग 1818 के एक समकालीन चित्र का विवरण इस पुल को कोटा के तत्कालीन रीजेंट झालिम सिंह द्वारा बनवाया गया बताता है।

पुल का निर्माण काल 1818 के आसपास होना अभिलेखीय सामग्री से पुष्ट है, लेकिन इसके वास्तविक निर्माणकर्ता और वित्तीय स्रोत को लेकर उपलब्ध स्रोतों में मतभेद है। वर्तमान शिलालेख जेम्स टॉड से इसका संबंध बताते हैं, जबकि लगभग उसी समय के ब्रिटिश अभिलेखीय चित्र का विवरण इसे झालिम सिंह द्वारा निर्मित बताता है।

हाड़ौती के इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता : जनता की भागीदारी

हाड़ौती के स्वतंत्रता संघर्ष को केवल कुछ क्रांतिकारियों की कहानी मानना अधूरा होगा।

1857 में कोटा में सैनिकों के साथ आम जनता की भागीदारी दिखाई देती है। 1942 में विद्यार्थी, महिलाएं और प्रजामंडल कार्यकर्ता आंदोलन में सक्रिय दिखाई देते हैं। नयनूराम शर्मा ने किसानों और ग्रामीण जनता को राजनीतिक चेतना से जोड़ने का काम किया, जबकि सूर्यमल्ल मिश्रण ने साहित्य के माध्यम से स्वाभिमान और प्रतिरोध की भावना को मजबूत किया।

इसी क्रम में रामपुरा कोतवाली पर 1942 का राष्ट्रीय ध्वज और 1857 में कोटा पर विद्रोहियों का लगभग छह महीने का नियंत्रण—दो ऐसी घटनाएं हैं, जो हाड़ौती के राजनीतिक इतिहास में जनता की सक्रिय भूमिका को सामने लाती हैं।

हाड़ौती की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत

रामपुरा कोतवाली, कैथूनीपोल, बोरखंडी पुल, नयनूराम शर्मा से जुड़े स्थान, सूर्यमल्ल मिश्रण की स्मृतियां और 1857 तथा 1942 से जुड़े अन्य स्थल केवल पुरानी इमारतें या घटनाएं नहीं हैं।

ये उस दौर के प्रमाण हैं जब हाड़ौती के लोगों ने अलग-अलग रूपों में अपने राजनीतिक अधिकार, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।

1857 में कोटा का जनविद्रोह और 1942 में रामपुरा कोतवाली का आंदोलन यह बताते हैं कि स्वतंत्रता की चेतना हाड़ौती में केवल 1947 के आसपास पैदा नहीं हुई थी। इसकी जड़ें कई दशक पहले तक जाती हैं।

आज जरूरत है कि इन घटनाओं को स्थानीय स्मृतियों के साथ-साथ राजकीय अभिलेखागार, राजस्थान सरकार के प्रकाशनों, ब्रिटिशकालीन अभिलेखों, पुराने समाचार-पत्रों और पुरातात्विक दस्तावेजों के आधार पर व्यवस्थित रूप से दर्ज किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां हाड़ौती के इस गौरवशाली इतिहास को तथ्य और प्रमाण के साथ जान सकें।

संदर्भ स्रोत:

  • राजस्थान सरकार, सुजस प्रकाशन।
  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की राजस्थान प्रजामंडल संबंधी सामग्री।
  • राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की राजस्थान इतिहास संबंधी सामग्री।
  • ब्रिटिश लाइब्रेरी के ऐतिहासिक अभिलेख एवं बोरखंडी पुल का 1818 के आसपास का चित्र-विवरण।
  • राजस्थान के 1857 विद्रोह और कोटा प्रजामंडल से संबंधित प्रकाशित ऐतिहासिक सामग्री।

मयूर टाइम्स न्यूज़

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