Friday, October 2, 2026
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धर्म की प्रभावना वही, जो आचरण से श्रद्धा जगाए : मुनि श्री योगसागर जी महाराज

कोटा। जैन दर्शन में धर्म केवल मानने, सुनने अथवा धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन को संयम, सदाचार और आत्मकल्याण की दिशा देने वाली साधना है। जब किसी श्रावक का आचरण स्वयं धर्म का प्रतिबिंब बन जाता है और उसके सद्व्यवहार से दूसरों के हृदय में जिनधर्म के प्रति श्रद्धा, विश्वास और अनुराग जागृत होता है, वहीं से सच्ची प्रभावना का प्रारंभ होता है।

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में चल रही चातुर्मास प्रवचनमाला में आचार्य समन्तभद्र स्वामी रचित ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ के श्लोक क्रमांक 18 के माध्यम से मुनि श्री ने सम्यग्दर्शन के प्रभावना अंग का आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक विवेचन किया।

आचरण से जागे श्रद्धा, वही सच्ची प्रभावना

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि श्रावक का धर्म केवल अपने आत्मकल्याण की साधना तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसका जीवन, व्यवहार और सद्प्रयास भी जिनशासन की प्रभावना का माध्यम बनना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रभावना का अर्थ मात्र धर्म का प्रचार-प्रसार करना नहीं है, बल्कि संयम, अहिंसा, सत्य, करुणा, त्याग एवं सदाचार से ऐसा वातावरण निर्मित करना है, जिससे दूसरों के मन में धर्म के प्रति श्रद्धा और आस्था जागृत हो।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति की वाणी में मधुरता, व्यवहार में अहिंसा, जीवन में संयम और हृदय में करुणा हो तो वह बिना किसी उपदेश के भी धर्म का संदेश समाज तक पहुंचा सकता है। इसलिए धर्म की सबसे प्रभावशाली पहचान हमारा स्वयं का आचरण है।

धर्मप्रभावना के अनेक माध्यम, भावना हो निष्काम

मुनि श्री ने कहा कि जिनालय निर्माण, जिनबिम्ब प्रतिष्ठा, जिनवाणी का प्रचार-प्रसार, धार्मिक साहित्य का प्रसार, साधु-संतों के प्रवचन, स्वाध्याय मंडलियों का संचालन तथा नई पीढ़ी को जैन संस्कारों से जोड़ना प्रभावना के महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

लेकिन इन सभी धार्मिक कार्यों की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब उनके पीछे यश, प्रदर्शन अथवा स्वार्थ नहीं, बल्कि निष्काम भावना और धर्म के प्रति गहरी श्रद्धा हो।

उन्होंने कहा कि भव्य आयोजन तभी प्रभावना बनते हैं, जब वे व्यक्ति को भीतर से धर्म के प्रति जागृत करें। धर्म की प्रभावना बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि जीवन में दिखाई देने वाले परिवर्तन से होती है।

नई पीढ़ी को संस्कार देना भी प्रभावना

मुनि श्री ने कहा कि माता-पिता का दायित्व है कि वे बच्चों को जैन संस्कारों से जोड़ें, जिनवाणी का नियमित स्वाध्याय कराएं और संतों की देशना को जीवन में उतारने की प्रेरणा दें। जब अगली पीढ़ी धर्म के सिद्धांतों को समझकर उन्हें आचरण में उतारती है, तब धर्म की प्रभावना निरंतर आगे बढ़ती है।

उन्होंने कहा कि अपने आचरण से समाज के सामने धर्म का आदर्श प्रस्तुत करना ही प्रभावना का श्रेष्ठ स्वरूप है। प्रभावना का उद्देश्य किसी अन्य मत अथवा व्यक्ति को छोटा दिखाना नहीं, बल्कि अपने धर्म के श्रेष्ठ सिद्धांतों को प्रेम, विनय, करुणा और सदाचार के साथ जन-जन तक पहुंचाना है।

मुनि श्री ने कहा कि जब धर्म हमारे जीवन में दिखाई देने लगे, तब हमारा प्रत्येक सद्कर्म जिनशासन की प्रभावना बन जाता है। धर्म को केवल सुनना नहीं, बल्कि जीवन में उतारना ही प्रभावना है। यही श्रावक का गौरव और जिनशासन की सच्ची सेवा है।

नसियां जी में उमड़ रही श्रद्धा की लहर

चातुर्मास प्रवचनमाला के दौरान नसियां जी में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर मुनि श्री योगसागर जी महाराज की अमृतमयी देशना का लाभ ले रहे हैं। धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। संपूर्ण मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, गुरुभक्ति और जिनवाणी के मंगलमय स्वरों से गुंजायमान रहा।

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

उपाध्यक्ष सुमित जैन एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन रीता, अजय सी.ए., उपेन्द्र, बबीता, आशीष, आदित्य, उदित, दीपक एवं नेमिनाथ बेरिग, तलवंडी, कोटा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन सुरेश कुमार, आरती, सिंघई जैन, जबलपुर तथा सुरेश कुमार एवं निशा, सिंघई जैन, जबलपुर परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।

धर्मचंद धनोप्या एवं दर्शन बरमुंडा ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन पुण्योदय भक्तामर मंडल परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।

अर्पित एवं सुनील माडिया ने बताया कि मुनि योगसागर जी महाराज के आहारदान तथा प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ की छात्राओं की शिक्षा हेतु कलश पुण्यार्जन का सौभाग्य मनीष धनोपिया, तलवास वाले, विज्ञान नगर परिवार को प्राप्त हुआ।

इसी क्रम में क्षुल्लक संयमसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य संतोष (सी.ए.), मुनीश एवं जैठानीवाल परिवार को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर वरुण एवं अजय सी.ए. द्वारा सम्पन्न किया गया।

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