– महावीर सेन जय स्थल बूंदी
बूंदी/2008 और 2026 के जातिगत आंकड़ों में बड़ा अंतर, सैन समाज की संख्या घटी तो कई जातियों की संख्या बढ़ी — राजेन्द्र सेन ने उठाए सवाल राजस्थान में सामने आए जातिगत आंकड़ों की 2008 और 2026 की तुलना को लेकर सवाल उठने लगे हैं। उपलब्ध तुलनात्मक विवरण में जाट, गुर्जर, माली, सैन-नाई, कुम्हार-प्रजापति और जांगिड़ समाज के आंकड़ों में अलग-अलग तरह के बदलाव दिखाई दे रहे हैं। हालिया ओबीसी रिपोर्ट को लेकर भी प्रदेश में जातिवार आंकड़ों और उनके आधार पर प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा तेज है।
सदस्य ओ बी सी एडवाइजरी काउंसिल एवं पूर्व नेशनल कॉर्डिनेटर आल इंडिया कांग्रेस ओ बी सी विभाग के
राजेन्द्र सेन ने कहा कि उपलब्ध कागज में दर्ज आंकड़ों को देखने पर विशेष रूप से सैन-नाई समाज की संख्या 2008 की तुलना में 2026 में कम दिखाई गई है, जबकि अन्य कई समाजों की संख्या में वृद्धि दर्शाई गई है। उन्होंने कहा कि जातिगत आंकड़ों की गणना की पद्धति और स्रोत सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
कागज में दिए गए 2008 एवं 2026 के आंकड़े
समाज
2008 में संख्या
2026 में संख्या
अंतर/बढ़ोतरी
माली
22,07,057
27,97,253*
+5,90,196 — लगभग 26.74%
कुम्हार/प्रजापति
21,49,097
29,97,901
+8,48,804 — 39.49%
सैन/नाई
9,95,968
8,86,043
-1,09,425 — 10.99% कमी
गुर्जर
30,29,494
32,68,863
+2,39,369 — 7.90%
जाट
59,92,380
71,76,325
+11,83,945 — 19.75%
* पहली पंक्ति में 2026 का अंक फोटो में हस्तलिखित है और पढ़ने में थोड़ा अस्पष्ट है; फोटो में दिए गए +5,90,196 और 26.74% के आधार पर 27,97,253 बनता है। इसे सरकारी मूल दस्तावेज से सत्यापित किया जाना चाहिए।
“सैन समाज की आबादी घट कैसे गई?”
राजेन्द्र सेन ने कहा कि 2008 में सैन-नाई समाज की संख्या 9,95,968 बताई गई थी, जबकि 2026 में यह 8,86,043 दर्शाई गई है। यानी 1,09,425 की कमी और लगभग 10.99 प्रतिशत की गिरावट दिखाई गई है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब सामान्य रूप से आबादी में वृद्धि होती है, तो सैन समाज की संख्या में इतनी बड़ी कमी का कारण क्या है? क्या सर्वे में सैन, नाई और इससे संबंधित उपनामों/समूहों को सही तरीके से दर्ज किया गया है? सरकार को इसका स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
माली समाज के आंकड़ों पर भी सवाल
सेन ने कहा कि माली समाज के संबंध में भी आंकड़ों की प्रस्तुति को स्पष्ट किया जाना जरूरी है। उपलब्ध विवरण में 2008 के 22,07,057 से 2026 में लगभग 27.97 लाख की संख्या दिखाई गई है। वहीं कुम्हार/प्रजापति समाज के लिए 29,97,901 का आंकड़ा है। इसलिए जातियों के नाम, उपजातियों को शामिल करने का तरीका और सर्वे की परिभाषा स्पष्ट किए बिना इन आंकड़ों से अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि हालिया रिपोर्टों में भी जाट 71.76 लाख, गुर्जर 32.68 लाख, कुम्हार-कुमावत करीब 29.97 लाख और माली-सैनी करीब 27.97 लाख जैसे आंकड़े सामने आए हैं।
“जातिगत आंकड़े पारदर्शी और सत्यापित हों”
राजेन्द्र सेन ने कहा कि जातिगत आंकड़े सामाजिक न्याय, आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आधार बनते हैं, इसलिए इनमें किसी भी प्रकार की गलती स्वीकार नहीं की जा सकती।
उन्होंने सरकार से मांग की कि:
“2008 और 2026 के आंकड़ों का आधार, सर्वे की पद्धति, जातिवार मूल डेटा और प्रत्येक जाति में शामिल किए गए उपनाम/उपजातियों की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए। विशेषकर सैन-नाई समाज की संख्या में आई कमी की स्वतंत्र रूप से जांच हो। किसी भी समाज को कम या अधिक दिखाने के बजाय वास्तविक जनसंख्या के आधार पर सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जाए।”
राजेन्द्र सेन ने कहा कि जाट, गुर्जर, माली, सैन-नाई, कुम्हार-प्रजापति और जांगिड़ सहित सभी ओबीसी समाजों के आंकड़ों में पूर्ण पारदर्शिता जरूरी है।






