कोटा। हाड़ौती की धरती पर भगवान शिव से जुड़ी अनेक प्राचीन धार्मिक परंपराएं आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं। इन्हीं में एक अनोखी परंपरा चारचोमा गांव स्थित प्राचीन पंचमुखी शिव मंदिर से जुड़ी है। कोटा शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित चारचौमा गांव में भगवान शिव की पंचमुखी प्रतिमा और अति प्राचीन मंदिर है। यहां भगवान शिव की पूजा के साथ उस कांवड़ की भी पूजा की जाती है, जिसे लेकर एक प्राचीन धार्मिक मान्यता प्रचलित है।
शिवजी के साथ कांवड़ की पूजा
किताब में दर्ज जानकारी के अनुसार, चारचौमा में शिवजी की पंचमुखी मूर्ति एवं अति प्राचीन मंदिर है। यहां कांवड़ के पलड़े के साथ शिवजी की पूजा की जाती है। इस परंपरा के पीछे भगवान रामायण काल से जुड़ी एक धार्मिक मान्यता बताई गई है।
मान्यता है कि लंका जीतने के बाद विभीषण ने भगवान शिव एवं हनुमानजी को पृथ्वी भ्रमण कराने की इच्छा जताई। इसके लिए विभीषण ने आठ कोस लंबी कांवड़ बनाई।
कांवड़ के एक पलड़े में भगवान शिव को और दूसरे पलड़े में हनुमानजी को विराजमान किया गया। इसके बाद भगवान शिव ने विभीषण के सामने एक शर्त रखी कि कांवड़ का पलड़ा जहां धरती को छू जाएगा, हम वहीं स्थापित हो जाएंगे।
चारचौमा में टिका कांवड़ का एक पलड़ा
जानकारी के अनुसार विभीषण के कांवड़ रखने पर अगला पलड़ा चारचोमा में शंकरजी का और पिछला पलड़ा रंगबाड़ी में हनुमानजी का टिका।
यही कारण बताया गया है कि चारचौमा में आज भी कांवड़ की पूजा की जाती है। इस धार्मिक परंपरा में केवल भगवान शिव की आराधना ही नहीं, बल्कि उस कांवड़ से जुड़ी लोकआस्था भी दिखाई देती है।
चारचौमा और रंगबाड़ी के बीच जुड़ी धार्मिक कड़ी
जानकारी के अनुसार कैथून स्थित विभीषण मंदिर से एकदम सीधे चार कोस की दूरी पर चारचौमा और चार कोस की दूरी पर रंगबाड़ी हनुमानजी का मंदिर है। इस भौगोलिक स्थिति को भी कांवड़ की धार्मिक मान्यता से जोड़कर देखा जाता है।
यही वजह है कि चारचौमा में कांवड़ की पूजा की परंपरा आज भी कायम है। सावन के दौरान इस परंपरा का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है तथा श्रद्धालु भगवान शिव के साथ कांवड़ से जुड़ी इस मान्यता के प्रति भी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
पंचमुखी शिवलिंग है मंदिर की खास पहचान
चारचोमा का मंदिर भगवान शिव की पंचमुखी प्रतिमा/शिवलिंग के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। हाल के विवरणों में भी चारचोमा के पंचमुखी महादेव मंदिर को प्राचीन धार्मिक एवं स्थापत्य विरासत के रूप में वर्णित किया गया है।
लोकमान्यता और इतिहास का अनूठा संगम
चारचौमा की विशेषता यही है कि यहां धार्मिक आस्था, लोककथा और स्थानीय परंपरा एक साथ दिखाई देती है। कांवड़ के दोनों पलड़ों से जुड़ी यह मान्यता पीढ़ियों से लोगों के बीच कही-सुनी जाती रही है और आज भी मंदिर में कांवड़ की पूजा इसी आस्था के साथ की जाती है।
यह परंपरा हाड़ौती की उन धार्मिक धरोहरों में शामिल है, जहां किसी मंदिर की पहचान केवल उसके गर्भगृह में विराजमान देवता से नहीं, बल्कि उससे जुड़ी सदियों पुरानी लोककथाओं और परंपराओं से भी बनती है।
चारचौमा का पंचमुखी शिव मंदिर इसलिए केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि हाड़ौती की धार्मिक स्मृतियों और लोकविश्वासों को संजोए हुए एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में सामने आता है।















