Thursday, June 25, 2026
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लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए आपातकाल के अत्याचारों से भावी पीढ़ी को अवश्य परिचित कराएँ – अरविन्द सिसोदिया

कोटा, 24 जून। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया ने आपातकाल की वर्षी के अवसर पर कहा कि ” 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक लागू रहा 21 माह का आपातकाल भारतीय के इतिहास का सबसे दमनकारी लोकतंत्र विरोधी कालखंड रहा है । ” उन्होंने कहा कि ” इस अवधि में सत्ता के केंद्रीकरण, नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन, प्रेस पर नियंत्रण, व्यापक गिरफ्तारियों, जबरन नसबंदी तथा प्रशासनिक दमन की घटनाओं ने मानवीय मूल्यों को गंभीरतम आघात पहुँचाया। इसलिए आपातकाल की वास्तविकताओं और उससे जुड़े अत्याचारों से भावी पीढ़ी को अवश्य परिचित कराया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी सत्ता लोकतंत्र का गला घोंटने का दुस्साहस न कर सके।”

सिसोदिया ने कहा कि ” आपातकाल केवल एक राजनीतिक हिटलरशाही की घटना नहीं थी, बल्कि वह ऐसा दौर था जिसमें संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया, असहमति को अपराध बना दिया गया और शासन नें नैतिक असहमति को कठोर दमन से कुचला । वहीं निर्दोष नागरिकों पर सत्तामद का अत्याचारी अहंकार वर्षा था। तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व नें अंग्रेजों और मुगलों के अत्याचार पुनः याद दिला दिये थे। ”

एक लाख से अधिक निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी

सिसोदिया ने कहा कि ” मीसा,डीआईआर और अन्य कानूनों का व्यापक दुरुपयोग करते हुए विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र नेताओं और आम नागरिकों को बिना मुकदमे के जेलों में बंद कर दिया गया था । उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार आपातकाल के दौरान देशभर में 1,10,806 से अधिक राजनैतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं को मीसा और डीआईआर के तहत गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा अन्य कानूनों के द्वारा भी कई कई हजार निर्दोष लोगों को जेलों में डाल दिया गया था।”

उन्होंने बताया कि ” लोकनायक जयप्रकाश नारायण, नानाजी देशमुख, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चंद्रशेखर, राजमाता विजयराजे सिंधिया, राजमाता गायत्री देवी, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव सहित अनेक प्रमुख नेताओं को जेलों में डाल दिया गया। उन्होंने कहा कि अनेक स्थानों पर राजनीतिक बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार और मानसिक तथा शारीरिक प्रताड़ना की शिकायतें बहुतायत में पाई गईं थीं।”

उन्होंने बताया कि ” उस समय भारतीय जेलों की क्षमता लगभग 1,83,369 कैदियों की थी, जबकि उनमें 2,20,146 कैदी बंद थे। इनमें 1,26,772 विचाराधीन कैदी भी शामिल थे। जिनमें बड़ी संख्या में राजनैतिक सामाजिक द्वेषता के कारण थी । इससे जेलों पर अत्यधिक दबाव उत्पन्न हो गया था। बंदियों का जेल जीवन भी अत्यंत कष्ट मय रहा। ”

संघ के स्वयंसेवकों की गिरफ्तारियां

सिसोदिया नें बताया कि ” इस दौरान प्रखर राष्ट्रवादी सामाजिक संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया गया। संघ के स्वयंसेवकों नें इस अत्याचार का लोकतान्त्रिक तरीके से प्रबल विरोध किया,आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल 1 लाख 30 हजार सत्याग्रहियों में से 1 लाख से अधिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के थे। मीसा के अधीन जो 30,000 लोग बंदी बनाए गए, उनमे से 25000 से अधिक संघ-संवर्ग के थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 कार्यकर्ता अधिकांशतः बंदीग्रहों और कुछ बाहर आपातकाल के दौरान बलिदान हो गए। उनमे संघ के अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख पांडुरंग क्षीरसागर भी थे। कांग्रेस के अत्याचारों का मुख्य फोकस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ था। ”

जबरन नसबंदी बना जन-उत्पीड़न का अभियान

सिसोदिया ने कहा कि “परिवार नियोजन के नाम पर चलाया गया नसबंदी अभियान आपातकाल की सबसे पीड़ादायक घटनाओं में से एक था। ” उन्होंने कहा कि ” सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों पर लक्ष्य पूरे करने का भारी दबाव डाला गया, जिसके कारण गरीबों, मजदूरों, रिक्शा चालकों, ग्रामीणों, अविवाहित युवकों तथा बुजुर्गों तक को जबरन नसबंदी के लिए बाध्य किया गया।”

उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि “उनके स्वयं के हाली ( वार्षिक कृषि मजदूर ) को भी जबरन पकड़कर ले जाया गया और उसकी नसबंदी कर दी गई थी।”

सिसोदिया ने बताया कि ” आपातकाल के 21 महीनों में पूरे देश में 1.07 करोड़ से अधिक नसबंदी ऑपरेशन किए गए। केवल सितंबर 1976 में ही लगभग 17 लाख नसबंदियाँ कर दी गईं, जो पूर्व वर्षों के वार्षिक औसत के बराबर थीं। वर्ष 1976-77 के लिए निर्धारित 43 लाख के लक्ष्य के मुकाबले लगभग 82 लाख नसबंदियाँ कराई गईं, जो लक्ष्य से लगभग 190 प्रतिशत अधिक थीं। यह जोर जबरदस्ती तत्कालीन कांग्रेस के चुनावों में सफाये का बड़ा कारण बनी। ”

प्रेस की स्वतंत्रता पर कठोर प्रहार

सिसोदिया ने कहा कि आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता लगभग समाप्त कर दी गई थी। समाचार-पत्रों पर सेंसरशिप लागू कर दी गई और कई अखबारों को प्रकाशन से पूर्व सामग्री सरकारी अधिकारियों को दिखाने के लिए बाध्य किया गया।

उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना करने वाले अनेक पत्रकारों और संपादकों को जेल भेजा गया तथा स्वतंत्र पत्रकारिता पर दबाव बनाया गया। जो समाचार संस्थान सरकारी दबाव के आगे नहीं झुके, उन्हें विभिन्न प्रकार की प्रशासनिक कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा।

मौलिक अधिकारों का निलंबन

सिसोदिया ने कहा कि “आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 22 तथा बाद में अनुच्छेद 19 से संबंधित अधिकार प्रभावी रूप से बाधित हो गए। नागरिकों के लिए प्रशासनिक दमन और अवैध हिरासत के विरुद्ध न्यायालयों में राहत प्राप्त करना अत्यंत कठिन हो गया था।” उन्होंने कहा कि “यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा दौर था, जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक सुरक्षा दोनों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया था।”

झुग्गियों और कच्चे पक्के मकानों पर बुलडोजर

सिसोदिया ने कहा कि शहरी सौंदर्यीकरण और अतिक्रमण हटाने के नाम पर दिल्ली सहित अनेक शहरों में गरीब बस्तियों और झुग्गियों को हटाने के अभियान चलाए गए। तुर्कमान गेट जैसी घटनाएँ आज भी उस दौर के दमन की प्रतीक बनीं, विरोध करने वाले नागरिकों के विरुद्ध बल प्रयोग और पुलिस कार्रवाई की घटनाएँ भी सामने आई थीं। वहीं यह तोड़फोड़ गांव गांव तक चबूतरों की तोड़फोड़ के रूप में सामने आई थी। ”

न्यायपालिका और प्रशासन पर दबाव

सिसोदिया ने कहा कि ” आपातकाल के दौरान न्यायपालिका और प्रशासन पर भी दबाव की स्थिति उत्पन्न हुई। सरकार से असहमति रखने वाले न्यायाधीशों के तबादले तथा पदोन्नति में उपेक्षा के आरोप सामने आए। वहीं हजारों सरकारी कर्मचारियों को समयपूर्व सेवानिवृत्त किया गया।”उन्होंने कहा कि ” शाह आयोग की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि अनेक अधिकारियों ने राजनीतिक दबाव में कार्य किया तथा कई मामलों में दस्तावेजों में हेरफेर, झूठे आधारों पर नजरबंदी और प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग जैसी घटनाएँ सामने आईं।”

जनता नें अत्याचारी कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया

सिसोदिया नें बताया कि ” तत्कालीन आम चुनाव में देश की जनता नें कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर सजा सुनाई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपनी रायबरेली से और उनके बेटे संजय गांधी अमेठी सीट से चुनाव हार गए। आपातकाल से सर्वाधिक प्रभावित उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया होगया, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली तो अन्य कई राज्यों में इक्की दुक्की सीटें ही मिलीं। जनता नें अपना कर्तव्य पूरा किया। ”

लोकतंत्र की रक्षा के लिए इतिहास को याद रखना आवश्यक

सिसोदिया ने कहा कि ” लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, स्वतंत्र न्यायपालिका और उत्तरदायी शासन उसकी आत्मा हैं।” उन्होंने कहा कि “आपातकाल के अनुभवों को भुलाना नहीं चाहिए। नई पीढ़ी को उस दौर के घटनाक्रम से परिचित कराना लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी भी सरकार द्वारा नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर इस प्रकार का आघात करने की पुनरावृत्ति न हो सके।”

 

 

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