जितेंद्र कुमार शर्मा
कोटा/शाहबाद क्षेत्र में प्रस्तावित हाइड्रो पावर परियोजना हेतु जंगलों की कटाई के विरोध में जनभावनाएँ तेज़ होती जा रही हैं। इस जनआंदोलन को अब शाहबाद के ऐतिहासिक राजपरिवार की वंशज श्रीमती अमिता शर्मा का भी सशक्त समर्थन प्राप्त हुआ है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शाहबाद की ऐतिहासिक विरासत और समृद्ध प्राकृतिक संपदा को किसी भी कीमत पर नष्ट नहीं होने दिया जाएगा।
अमिता शर्मा ने कहा कि शाहबाद केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति, लोकश्रुतियों और प्रकृति के साथ मानव के सह-अस्तित्व का जीवंत उदाहरण है। यहाँ के घने जंगल, जलस्रोत, किला, बावड़ियाँ और लोक परंपराएँ मिलकर एक ऐसी धरोहर बनाती हैं, जिसे विकास के नाम पर बलिदान नहीं किया जा सकता।
उन्होंने शाहबाद के इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि लोकश्रुति के अनुसार शाहबाद के किले पर शासन करने वाले ब्राह्मणों को भोज का निमंत्रण देकर छलपूर्वक राजपाट छीना गया था। तभी से लोककथाओं में यह प्रसंग प्रचलित है कि लड्डू–दाल–बाटी के भोजन के प्रलोभन में, बहादुर होते हुए भी, राज हाथ से चला गया। इस ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख “खांडेराव रासो” (1960) में भी मिलता है। यह इतिहास शाहबाद की अस्मिता से जुड़ा हुआ है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
अमिता शर्मा शाहबाद के ब्राह्मण राजपरिवार की वंशज हैं। स्वतंत्रता के बाद उनका खानदान मध्यप्रदेश के गुना जिले में ग्वारखेड़ा–लोडेरा जागीर का स्वामी रहा, जो उन्हें माधवराव सिंधिया प्रथम द्वारा प्रदान की गई थी। उनके पूर्वजों में रघुनंदन, मिश्रीलाल, यादव सिंह सहित अनेक प्रतिष्ठित नाम रहे हैं। उनके छह पुत्रों में बृजराज सिंह कोठारी हुए, जिनके वंश में अमिता शर्मा के ताऊजी श्रीमंत कोठारी रहे।
आज भी इस खानदान से जुड़े वंशज ग्वालियर, गुना तथा शाहबाद क्षेत्र के केलवाड़ा, भंवरगढ़ और समरानिया जैसे गांवों में निवासरत हैं। परंपरा के अनुसार, प्रत्येक वर्ष बैशाख माह में यह परिवार शाहबाद किले की बावड़ी पर अपने इष्ट देव की पूजा के लिए एकत्र होता है, जो इस क्षेत्र से उनके भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाता है।
अमिता शर्मा ने प्रशासन और सरकार से अपील की कि शाहबाद के जंगलों को काटकर हाइड्रो पावर प्लांट स्थापित करने के निर्णय पर पुनर्विचार किया जाए। उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वैकल्पिक स्थानों पर परियोजनाएँ स्थापित कर शाहबाद की ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सकता है।
उन्होंने स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों, इतिहासकारों और पर्यावरणविदों से भी इस आंदोलन में एकजुट होकर भाग लेने का आह्वान किया, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए शाहबाद की पहचान, उसकी हरियाली और उसका गौरव अक्षुण्ण रह सके।






