“विद्या वह दीपक है जो जीवन को प्रकाश देता है, और धर्म वह दिशा है जो उस प्रकाश को सही मार्ग पर ले जाती है।”
कोटा | मुनि पुंगव सुधा सागर बालिका छात्रावास में आर्यिका 105 प्रशममति माताजी ने छात्रावास की बालिकाओं को प्रेरणादायक प्रवचन देते हुए कहा कि विद्यार्थियों के जीवन में लौकिक शिक्षा के साथ धार्मिक शिक्षा का समन्वय अत्यंत आवश्यक है। केवल पुस्तकीय ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता, जब उसमें धर्म, संस्कार और सदाचार का समावेश होता है तब ही जीवन वास्तव में उज्ज्वल और सफल बनता है।
अध्यक्ष श्रीमती अर्चना (रानी) दुगेरिया सर्राफ ने बताया कि माताजी ने कहा कि धर्म मनुष्य को सही मार्ग दिखाता है। यदि विद्यार्थी जीवन में ही धर्म, संयम और संस्कारों को अपनाया जाए तो व्यक्ति का चरित्र मजबूत बनता है और वही आगे चलकर समाज और राष्ट्र के लिए आदर्श बनता है।
उन्होंने बालिकाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि प्रतिदिन अपनी दिनचर्या का प्रारम्भ मंगलाचरण, णमोकार महामंत्र और देव दर्शन से करना चाहिए। इससे मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा आत्मबल बढ़ता है।
माताजी ने बताया कि भारतीय संस्कृति में विनय और संस्कार का विशेष महत्व है। भगवान, गुरु, माता-पिता, राजा, अधिकारी तथा श्रेष्ठ जनों के पास कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। यह हमारी संस्कृति में श्रद्धा, विनम्रता और कृतज्ञता का प्रतीक माना गया है।
उन्होंने छात्राओं को पढ़ाई के प्रति एकाग्र रहने की प्रेरणा देते हुए कहा कि यदि मन लगाकर, अनुशासन और नियमितता के साथ अध्ययन किया जाए तो निश्चित रूप से श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त होते हैं। साथ ही जीवन में संयम, सादगी और सदाचार को अपनाने से व्यक्ति का व्यक्तित्व महान बनता है।
इस अवसर पर कार्यकारिणी की अध्यक्ष श्रीमती अर्चना (रानी) दुगेरिया सर्राफ, डॉ. संतोष जैन, रूपल नगेदा, पिंकी ठाई, हेमलता धनोप्या सहित कई कार्यकारिणी सदस्य एवं जैन समाज की श्रेष्ठी महिलाएं उपस्थित रहीं। सभी ने माताजी के मंगलमय उपदेशों का लाभ प्राप्त किया।






