आलेख – अरविन्द सिसोदिया
( लेखक, विश्लेषक और ब्लॉगर )
याद रहे कि भारत पर विदेशी आक्रमणकारी तभी आये जब उन्हें कोई न कोई अपने यहाँ से बुलाने गया या उनको साथ देनें खडे हुआ। आंतरिक फूट की यह प्रवृति भारत को हमेशा नुकसान पहुंचाती रही है। इसलिए संकेतों को स्पष्टता से आम जनमत को समझ कर, इस तरह की मनोवृत्ति वालों से सावधान रहना होगा। दिन प्रतिदिन विश्व राजनीती और उसका स्वार्थवाद रंग बदल रहा है। यशे में राष्ट्रहित के प्रति एक जुट रहने की बड़ी आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में भारत ने राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक स्तर पर जिस आत्मविश्वास के साथ वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बनाई है, उससे कुछ अंतरराष्ट्रीय शक्तियाँ असहज हो रहीं है। इतिहास गवाह है कि जब भी कोई राष्ट्र स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ता है, तो उसे रोकने के लिए प्रत्यक्ष ही नहीं, अपरोक्ष षड्यंत्र भी रचे जाते हैं। आज भारत उसी दौर से गुजर रहा है। विदेशी ताकतों के कुप्रयासों को दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से अंदर से भी समर्थन दिया जा रहा है।
अमेरिका और यूरोप में सक्रिय कुछ प्रभावशाली व्यक्ति, संस्थाएँ, सांम्प्रदायिक और वैचारिक नेटवर्क भारत की सरकार, उसकी सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रवादी सोच को योजनाबद्ध ढंग से निशाना बना रहे हैं। अमेरिका के अति संम्पन्न और फंडिंग करने वाले जॉर्ज सोरोस जैसे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के बयान केवल व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि उस वैश्विक मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं जो राष्ट्रवादी और प्रगतिशील सरकारों को असहज मानती है। उनका अतीत विभिन्न देशों में चुनी हुई सरकारों के विरुद्ध वैचारिक हस्तक्षेप से अदृश्य तौर तरीकों से जुड़ा रहा है।
इसी क्रम में अमेरिका की हिंडनबर्ग रिपोर्ट द्वारा भारत के प्रमुख औद्योगिक समूह को निशाना बनाना महज़ कॉरपोरेट विश्लेषण नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक साख को चोट पहुँचाने का प्रयास स्पष्टतः प्रतीत होता है। रिपोर्ट के बाद जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाए, वह संयोग नहीं हैँ बल्कि सुनियोजित प्रयोग हैँ। यह स्पष्ट है कि आज आर्थिक सम्पन्नता का हथियार भी भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका हैं।
वैचारिक मोर्चे पर अमेरिका में आयोजित ” डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व ” सम्मेलन ने हिंदू पहचान और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया। इसे अकादमिक विमर्श कहा गया, किंतु जब किसी राष्ट्र की बहुसंख्यक संस्कृति को ‘विघटित’ करने का विचार प्रचारित हो, तो वह बौद्धिक बहस नहीं, वैचारिक आक्रमण बन जाता है।” क्योंकि भारतीय सनातन संस्कृति विश्व में सबसे पुरातन और समृद्ध शोधों को अपने आपमें रक्षित रखते हुये बढ़ रही है।
चिंता तब और बढ़ती है जब कुछ भारतीय राजनीतिक चेहरे विदेशी मंचों पर भारत की संस्थाओं, लोकतंत्र और शासन व्यवस्था को कमजोर दिखाते हैं। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, पर विदेशों में जाकर अपने ही देश की छवि धूमिल करना राष्ट्रहित की सीमा को लांघना है।
भारत कोई प्रयोगशाला नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सभ्यता और आत्मसम्मान से निर्मित राष्ट्र है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत आत्मनिर्भरता और वैश्विक सम्मान की ओर अग्रसर है। उसे रोकने के प्रयास होंगे, परंतु राष्ट्र के रूप में हमें सजग, एकजुट और दृढ़ रहना होगा। हर चुनौती को परास्त करने की दक्षता रखनी होगी। इसलिए सावचेतना ज़रूरी है।






