ग़ज़ल
शकूर अनवर
खॅंडर दिल के हालात अच्छे नहीं हैं।
मुसाफ़िर अब इसमें ठहरते नहीं हैं।।
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न हो जिसमें ख़ुद को बदलने की ख़्वाहिश।
सितारे भी उसके बदलते नहीं हैं।।
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अभी धूप का रक़्स* है आसमाॅं पर।
अभी आसमाॅं पर परिंदे नहीं हैं।।
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बहुत ख़ुश हूंँ मिलने का वादा है उनका।
मगर वो जो कहते हैं करते नहीं हैं।।
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सिफ़त मोम की उनमें आये कहाँ से।
सनम पत्थरों के पिघलते नहीं हैं।।
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मुहब्बत की झनकार बाक़ी है इनमें।
अभी दिल के कुछ तार टूटे नहीं हैं।।
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अभी आस बाक़ी है महरो-करम* की।
अभी देवता मुझसे रूठे नहीं हैं।।
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अगरचे ज़माना है अच्छे दिनों का।
हमारे तो दिन फिर भी अच्छे नहीं हैं।।
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समन्दर को दुख है तो बस इतना “अनवर”।
जिन्हें डूबना था वो डूबे नहीं हैं।।
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शब्दार्थ:-
रक़्स*नृत्य
सिफ़त”गुण विशेषता
महरो-करम* मेहरबानी कृपाऍं
शकूर अनवर
9460851271
ग़ज़ल -शकूर अनवर





