ग़ज़ल
शकूर अनवर
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दुनिया में अब प्यार कहाँ।
सपनों का संसार कहाँ।।
नज़रों की तलवार कहाँ।
अब वो दिल पर वार कहाँ।।
मज़लूमों* की बस्ती में।
तुम आये सरकार कहाँ।।
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तूफ़ानों में घिर आये।
ले आई मॅंजधार कहाँ।।
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काग़ज़ी नावें डूबेंगी।
है इनमें पतवार कहाँ।।
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अपने जुनूँ* में डूबे हैं।
दीवाने हुशियार कहाँ।।
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हर दिन मेहनत मज़दूरी।
अपने लिए इतवार कहाँ।।
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दिल तो दुखों का सागर है।
इसका “अनवर” पार कहाँ।।
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शकूर अनवर
मज़लूमों*पीड़ितों
जुनूँ*दीवानगी,जोश
9460851271
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ग़ज़ल
शकूर अनवर
सफ़र में जब सुकूते शाम* आया।
मुसाफ़िर को बड़ा आराम आया।।
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न वो आया न कुछ पैग़ाम* आया।
तड़पना दिल का फिर किस काम आया।।
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वही महफ़िल में रक़्से-ज़िंदगी* है।
वही गर्दिश* में अपना जाम आया।।
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चिराग़ों को सियासत ने बुझाया।
मगर फिर भी हवा का नाम आया।।
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बहुत ताक़त थी जिसके बालो-पर* में।
परिंदा वो भी जे़रे-दाम* आया।।
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कोई बुत* दिल में आकर बस गया क्या।
लबों पर क्यूँ ख़ुदा का नाम आया।।
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ख़िरद* हर गाम पर भटका रही थी।
जुनूॅं* का रास्ता ही काम आया।।
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निकलना था हमें जन्नत से “अनवर”।
मगर आदम पे ये इल्ज़ाम आया।।
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शब्दार्थ:-
सुकूते शाम*शाम का सन्नाटा
पैग़ाम*संदेश
रक़्से-ज़िंदगी*जीवन नृत्य
गर्दिश*चक्र मुसीबत
बालो-पर* पक्षी के बाल और पर
जे़रे-दाम* जाल में फसा हुआ
बुत*मूर्ति प्रेमिका ख़िरद*अक़्ल, समझदारी
जुॅंनू*दीवानगी
9460851271
ग़ज़ल -शकूर अनवर





