ग़ज़ल
शकूर अनवर
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चोट दिल पर पड़ी है बाबूजी।
ऑंसुओं की झड़ी है बाबूजी।।
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कैसी मुश्किल घड़ी है बाबूजी।
सबको अपनी पड़ी है बाबूजी।।
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नफ़रतें लाख दिल में घर करलें।
इक मुहब्बत बड़ी है बाबूजी।।
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चैन मिलता नहीं किसी सूरत।
आँख जबसे लड़ी है बाबूजी।।
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उॅंगलियों से कुरेदते क्या हो।।
ऐसी क्या शय* गड़ी है बाबूजी।
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इक सहारा है जिससे चलता हूँ।
आपकी ही छड़ी है बाबूजी।।
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ढ़ेर बारूद का है इक “अनवर”।
जिस पे दुनिया खड़ी है बाबूजी।।
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शकूर अनवर
शय*वस्तु
9460851271
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ग़ज़ल
शकूर अनवर
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सपनों को साकार करेंगे।
आख़िर दरिया पार करेंगे।।
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माना सच में लाभ नहीं है।
घाटे का व्यापार करेंगे।।
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अपने अन्दर चोर छुपा है।
ख़ुद को पहरेदार करेंगे।।
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ख़ुशियों के अभिलाषी मन को।
ग़म के लिये तैयार करेंगे।।
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तूफ़ाॅं से अब डरना कैसा।
इससे आँखें चार करेंगे।।
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हथियारों की होड़ में “अनवर”।
हम भी क़लम तलवार करेंगे।।
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शकूर अनवर
9460851271
ग़ज़ल – शकूर अनवर





