ग़ज़ल
शकूर अनवर
*
तोड़ डाला है मेरा सपना क्यूँ।
लूट ली तुमने मेरी दुनिया क्यूँ।।
*
क्या सियासत भी इक तमाशा है।
फिर सियासत का ये तमाशा क्यूँ।।
*
जिसको पल-पल मैं याद करता हूँ।
भूल जाता है वो हमेशा क्यूँ।।
*
जिसने रोशन किया हो महलों को।
वो दीया रास्ते में जलता क्यूँ।।
*
जिसकी अपनी अलग ही दुनिया हो।
फिर वो देखे हमारी दुनिया क्यूँ।।
*
क्या समन्दर ने बेरुखी बरती।
लौट आया पलट के दरिया क्यूँ।।
*
क्या ये सूरज हुआ अमीरों का।
हम ग़रीबों को फिर अंधेरा क्यूँ।।
मैं तो गोशा-नशीन* हूँ “अनवर”।
मेरे पीछे पड़ा ज़माना क्यूँ।।
*
शकूर अनवर
गोशा-नशीन*एकांतवासी
9460851271
ग़ज़ल- शकूर अनवर






