Sunday, April 19, 2026
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श्रीमद्भगवद्गीता – कालीचरण राजपूत

 

गीता श्लोक 10/23…

भगवान की विभूतियां….

 

भगवान कहते हैं कि रुद्रों में शंकर और यक्ष, राक्षसों में कुबेर मैं हूं। पवित्रों में पवित्र करने वाली अग्नि और शिखर, पर्वतों में सुमेर पर्वत मैं हूं ।

भगवान कहते हैं कि हर, बहुरूप, त्रयंबक आदि 11 रूद्र हैं, उन रुद्रों में शंभू अर्थात शंकर सबके अधिपती हैं । यह कल्याण प्रदान करने वाले और कल्याण स्वरुप हैं । इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति बताया है ।

कुबेर, _यक्ष और राक्षसों के अधिपती हैं । इनको धन अध्यक्ष अर्थात धन के अध्यक्ष अर्थात धनपति के पद पर नियुक्त किया गया है । सब यक्ष, राक्षसों में मुख्य होने से, भगवान की विभूति बताए गए हैं । धर, ध्रुव, सोम आदि आठ वसुओं में अनल अर्थात पावक अर्थात अग्नि सब के अधिपति हैं । यह सब देवताओं को यज्ञ की हवि अर्थात होम की जाने वाली सामग्री पहुंचाने वाले तथा भगवान के मुख्य हैं । इसलिए इनको भगवान ने अपनी विभूति बताया है ।

धातु जैसे सोना, चांदी, तांबे आदि के शिखर वाले जितने पर्वत हैं, उनमें सुमेर पर्वत मुख्य है । यह सुमेर पर्वत सोने तथा रतन का भंडार है । इसलिए भगवान ने इसको अपनी विभूति कहा है ।

वह वस्तु है जिनमें कुछ महत्व या विशेषता दिखती है, वह विभूतियों के मूल रूप परमात्मा से आई है । अतः इन विभूतियों में परमात्मा का ही चिंतन होना चाहिए ।

 

गीता श्लोक 10/24..

भगवान की विभूतियां ….

भगवान कहते हैं कि हे पार्थ ! पुरोहितों में मुख्य वृहस्पति को मेरा स्वरूप समझो ।सेनापतियों में कार्तिकेय और जलाशयों में समुद्र मैं हूं।

भगवान कहते हैं कि संसार के संपूर्ण पुरोहितों में और विद्या बुद्धि में बृहस्पति श्रेष्ठ हैं । यह इंद्र के गुरु हैं और देवताओं के कुल पुरोहित हैं । इसलिए भगवान ने अर्जुन से बृहस्पति को अपनी विभूति जानने अर्थात मानने के लिए कहा है । स्कंद अर्थात कार्तिकेय अर्थात शंकर जी के जेष्ठ पुत्र हैं । उनके छह मुख और 12 हाथ हैं । यह देवताओं के सेनापति हैं और संसार के सभी सेनापतियों में श्रेष्ठ है, इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति बताया है ।

इस पृथ्वी पर जितने जलाशय हैं, उनमें समुद्र सबसे बड़ा है । समुद्र समस्त जलाशयों का अधिपति है और अपनी मर्यादा में रहने वाला है तथा भगवान ने इसे अपनी विभूति बताया है । एवं विभूतियों में जो अलौकिकता दिखती है, यह उनकी खुद की नहीं है। वरन भगवान की है और भगवान से ही आई है । अतः इनको देखने पर भगवान की ही स्मृति होनी चाहिए ।

 

गीता श्लोक 10/25…

भगवान की विभूतियां….

 

भगवान कहते हैं कि महर्षियों में भृगु और वाणियों अर्थात शब्दों में एक अक्षर प्रणव मैं हूं । संपूर्ण यज्ञों में जप यज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय मैं ही हूं ।

 

भगवान का कहना है कि भृगु, अत्र, मरीचि, आदि महर्षियों में भृगुजी बड़े भक्त, ज्ञानी और तेजस्वी हैं । इन्होंने ही ब्रह्मा विष्णु और महेश इन तीनों की परीक्षा करके भगवान विष्णु को श्रेष्ठ सिद्ध किया । भगवान विष्णु भी अपने बक्षस्थल पर उनके चरण चिन्ह को भ्रगुलता नाम से धारण करते हैं । इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति बताया है । सबसे पहले तीन मंत्र वाला प्रणव प्रकट हुआ । फिर प्रणव से त्रिपदा गायत्री । त्रिपदा गायत्री से वेद और वेदों से शास्त्र पुराण आदि संपूर्ण वांग्मय अर्थात वाणी युक्त जगत प्रकट हुआ है। अतः इन सब का कारण होने से और इन सब में श्रेष्ठ होने से भगवान ने एक अक्षर प्रणव अर्थात ओम को अपनी विभूति बताया है।

मंत्रों से जितने यज्ञ किए जाते हैं उनमें अनेक वस्तु पदार्थ की आवश्यकता पड़ती है और उनके करने में कुछ न कुछ दोष आ ही जाता है । परंतु जब यज्ञ अर्थात भगवान का नाम जप करने में किसी पदार्थ या विधि की आवश्यकता नहीं पड़ती । इनको करने में दोष आना तो दूर रहा वरन सभी स्वतंत्र हैं । भिन्न-भिन्न संप्रदायों में भगवान के नाम में अंतर तो होता है, पर नाम जप से कल्याण होता है । भगवान ने जप यज्ञ को अपनी विभूति बताया है । पर्वतों में श्रेष्ठ हिमालय को भी अपनी विभूति बताया है ।

गीता श्लोक 10/26…….

भगवान की विभूतियां……

भगवान कहते हैं कि संपूर्ण वृक्षों में पीपल, देवर्षियों में नारद, गंधर्वों में चित्र रथ और सिद्धों में कपिल मुनि मैं ही हूं ।

भगवान के अनुसार पीपल एक सौम्य वृक्ष है । ऐसा कहा जाता है कि इसकी नीचे प्रत्येक प्रकार का वृक्ष लग जाता है तथा यह पहाड़, मकान, दीवार, छत आदि सभी जगह पर उग जाता है । पीपल के वृक्ष के पूजन की महिमा है ।अतः भगवान ने इसे अपनी विभूति बताया है ।

देवर्षि नारद भगवान के कहे अनुसार चलते हैं ।नारद की बात पर मनुष्य ,देवता, नाग, गंधर्व सभी विश्वास करते हैं ।नारद को भगवान ने अपनी विभूति बताया है ।

गंधर्व “चित्र रथ” और सिद्धों में “कपिल मुनि” को भी अपनी विभूति बताया है ।

गीता श्लोक 10/27………

भगवान की विभूतियां……..

भगवान कहते हैं कि घोड़ों में, अमृत के साथ समुद्र से प्रकट होने वाले, उच्चैध्रवा नामक घोड़े को श्रेष्ठ, हाथियों में ऐरावत नामक हाथी को और मनुष्यों में राजा को मेरी विभूति मानो ।

समुद्र मंथन के समय प्रकट होने वाले चौदह रत्नों में उच्चैश्ववा घोड़ा भी एक रत्न है । यह इंद्र का वाहन है और संपूर्ण घोड़ों का राजा है । इसलिए भगवान ने उसे अपनी विभूति कहा है ।

सारी प्रजा का पालन और संरक्षण करने वाला राजा संपूर्ण पुरुषों में श्रेष्ठ है । इसलिए भगवान ने उसे अपनी विभूति बताया है । इन सब में सामर्थ्य भगवान से ही आई है , अतः इन्हें भगवान का ही मानना चाहिए ।

गीता श्लोक 10/28…

भगवान की विभूतियां …

भगवान कहते हैं कि आयुधों में वज्र और धेनुओं में कामधेनु मैं ही हूं ।संतान उत्पत्ति का हेतु कामदेव मैं हूं और सर्पों में वासुकी मैं ही हूं ।

जिन साधनों या हथियारों से युद्ध किया जाता है, आयुध कहते हैं। इन आयुधों में वज्र मुख्य है । इसे दधीचि के हड्डियों से बनाया गया था । उसलिए भगवान ने इसे अपनी विभूति बताया है ।

नई ब्याही हुई गायों को धेनु कहते हैं। सभी धेनुओं में कामधेनु मुख्य है । यह समुद्र मंथन के समय प्रकट हुई थी। यह देवताओं और मनुष्यों की कामना पूर्ति करने वाली है । अतः भगवान ने उसे अपनी विभूति बताया है ।

गीता श्लोक 10/29….

भगवान की विभूतियां ….

भगवान कहते हैं किनागिन के अनंतानंत (शेषनाग)और जल जंतुओं का अधि वरुण (जल का देवता) मैं हूं । पितरों में अर्यमा और शासन करने वालों में यमराज हूं ।

शेषनाग संपूर्ण नागों के राजा हैं । इनके एक हजार फैन हैं । ये क्षीर सागर में सदा भगवान की शैया बनकर भगवान को सुख पहुंचाते रहते हैं । ये अनेक बार भगवान के साथ अवतार लेकर उनकी लीला में शामिल हुए हैं ।

वरुण देव संपूर्ण जल जंतुओं के तथा जल देवताओं के अधिपति हैं और भगवान के भक्त हैं, इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति बताया है । काव्य, वह, अनिल, सोम, आदि सात पित्रगण हैं, इन सब में अर्यमां नाम वाले मुख्य हैं । इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति माना है । प्राणियों पर शासन करने वाले राजा आदि जितने भी अधिकारी हैं, उनमें यमराज मुख्य हैं । यह प्राणियों को उनके पाप पुण्य का फल भगत कर शुद्ध करते हैं । यह भगवान के भक्त और लोकपाल भी हैं, इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति बताया है ।

गीता श्लोक 10/30….

भगवान की विभूतियां …

भगवान कहते हैं कि दैत्यों में प्रहलाद और गणना करने वालों में अर्थात ज्योतिषियों में काल मैं हूं तथा पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़ मैं हूं ।

जो दिती से उत्पन्न हुए हैं, उनको दैत्य कहते हैं । उन दैत्यों में प्रहलाद जी मुख्य हैं और श्रेष्ठ हैं । यह भगवान के परम विश्वासी हैं और निष्काम प्रेमी भक्त हैं । इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति बताया है । प्रहलाद तो पहले भी हो चुके हैं । परंतु भगवान ने कहा है कि दैत्य में प्रहलाद मैं हूं । इस तरह वर्तमान काल का प्रयोग किया है । इससे सिद्ध होता है कि भगवान के भक्त नित्य रहते हैं तथा श्रद्धा भक्ति के अनुसार दर्शन भी देते हैं । उनके भगवान में लीन हो जाने के बाद अगर कोई उनको याद करता है और उनके दर्शन चाहता है तो, उनका रूप धारण करके दर्शन देते हैं ।

ज्योतिष शास्त्र में काल अर्थात समय से ही आयु की गणना होती है । इसलिए क्षण, घड़ी, पक्ष, मास, वर्ष आदि गणना करने के साधनों में “काल” भगवान की विभूति हैं । बाघ, हाथी, चीता, रीछ आदि जितने पशु हैं उन सब में “सिंह” बलवान है तेजस्वी और प्रभावशाली है,शूरवीर और साहसी है । यह उन सब पशुओं का राजा है । इसलिए भगवान ने इसको अपनी विभूति बताया है । विनिता के पुत्र गरुड़ जी संपूर्ण पक्षियों के राजा हैं और भगवान के भक्त भी है । यह भगवान विष्णु के वाहन हैं और जब यह उड़ते हैं, तब इनको पंखों से स्वतः “सामवेद” की ऋचाएं ध्वनित होती हैं, इसलिए भगवान ने इन्हें अपनी विभूति बताया है ।

गीता श्लोक 10/31…

भगवान की विभूतियां …

भगवान कहते हैं की पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्र धारी में राम मैं हूं । जल जंतुओं में मगर अर्थात मगरमच्छ मैं हूं और नदियों में गंगा जी मैं हूं ।

भगवान कहते हैं कि वायु से सब चीज पवित्र होती है। वायु से ही निरोगता आती है, अतः भगवान ने पवित्र करने वालों में वायु को अपनी विभूति बताया है । वैसे तो राम अवतारी हैं और साक्षात भगवान है, परंतु जहां शस्त्र धारी की बात आती है, राम उन सब में श्रेष्ठ हैं । इसलिए भगवान ने राम को अपनी विभूति बताया है । जल के जंतुओं में मगरमच्छ सबसे अधिक बलवान है, इसलिए जल जंतुओं में मगरमच्छ को भगवान ने अपनी विभूति बताया है । प्रवाह रूप से बहने वाले जितने नद, नाले और झरने हैं, उन सब में गंगा जी श्रेष्ठ हैं । यह भगवान की खास चरणों दक है। गंगा जी अपने दर्शन, स्पर्श आदि से दुनिया के लोगों का उद्धार करने वाली हैं । मरे हुए मनुष्यों की अस्थियां गंगा में डालने से उनकी सद्गति हो जाती है । इसलिए भगवान ने गंगा जी को अपनी विभूति बताया है ।

गीता श्लोक 10/32….

भगवान की विभूतियां ….

भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! संपूर्ण सृष्टियों के आदि, मध्य तथा अंत में मैं ही हूं । विद्याओं में आत्म विद्या अर्थात ब्रह्म विद्या और परस्पर शास्त्रार्थ करने वालों का तत्व निर्णय के लिए किया जाने वाला “वाद” में ही हूं ।

भगवान का कहना है कि जितने सर्ग और महासर्ग होते हैं अथवा जितने प्राणियों की उत्पत्ति होती है, उसके आदि में मैं रहता हूं, उसके मध्य में मैं रहता हूं और उसके अंत में अर्थात उसके लीन होने पर भी मैं ही रहता हूं । सब कुछ भगवान ही हैं, अतः संसार को प्राणियों को देखते ही भगवान की याद आनी चाहिए ।

जिस विद्या से मनुष्य का कल्याण हो जाता है, वह विद्या अर्थात अध्यात्म विद्या कहलाती है । अध्यात्म विद्या के प्राप्त होने पर पढ़ना, जानना कुछ भी बाकी नहीं रहता । इसलिए भगवान ने इसको अपनी विभूति बताया है । आपस में जो शास्त्रार्थ किया जाता है, उसे “वाद” कहते हैं शास्त्रार्थ या बाद तीन प्रकार का कहा गया है_

एक _ “जल्प” इसमें अपने पक्ष की मजबूती और विरोधी पक्ष का खंडन किया जाता है ।

दो_ “बितंडा” अपना कोई भी पक्ष न रखकर दूसरे पक्ष का लगातार खंडन करना ।

तीन _ “वाद” बिना किसी पक्षपात के केवल तत्व निर्णय के लिए आपस में शास्त्रार्थ करना “वाद” है

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