चलगी गंगा छोड कै [माता सत्यवती भाग -1]
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मेफिल इंदर लोक मं,नूत्या सब नै जार।
नाच गाण ग्या देखबा,बरमा गंगा लार।।
महाभीस पै रीझगी,गंगा वांनै देख।
मरयादा नै लांघगी,खची करम की रेख।।
उडगी ऊंकी ओडणी,दीख्यो संदो डील।
नेण मलाया नेण सूं,छबी काळजै कील।।
भरी सभा मं रीझ कै,करद्यो थांनै पाप।
मरत लोक थे भोगसी,बरमा दिया सराप।।
महाभीस जनम्यां धरा,बरमा जी को न्याव।
बणग्या राजा सांतनू,गंगा करल्यो ब्याव।।
जणकै गंगा पूत नै,जार बुवाती नीर।
कस्यांन देखै सांतनू,बदती वांकी पीर।।
सात पूत के बाद मं,जण्यो आठवों पूत।
ईंनै पड़सी टोंकणो,जदी बेठसी सूत।।
गंगा थू मारै मती,खामी सोरै पाप।
बेटो म्हारो सूंप दै,म्हूं छूं ईंको बाप।।
राजा नै वा टोंक दी,सरत गया वे हार।
गंगा चलगी सरग मं,बेटो लेगी लार।।
असतर ससतर सीखणा,गुरू हेरल्या खास।
देवबरत नै मेलद्यो,परसराम कै पास।।
असतर ससतर सीखल्या,देकै ऊंनै ध्यान।
परसराम कै पास मं,पायो संदो ग्यान।।
देवबरत नै छोडणो,होग्यो वू मोट्यार।
गंगा उतरी सा धरा,देवबरत बी लार।।
मायड़ बेटो सूंपगी,राख काळजै गाड।
राजी रीजै पूत थू,बाप लडासी लाड।।
नार बगर फोड़ा पड़ै,दमना सा माराज।
चलगी गंगा छोड कै,देवबरत युवराज।।
रचनाकार-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’
शिवपुरा,कोटा
धीवर की वा लाडली [ माता सत्यवती भाग-2]
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राणी हुई रजसवला,पीव सुधनवा दूर।
चंता मं वा डूबगी,मदरो पड़ग्यो नूर।।
गयो पखेरू हेरबा,लेग्यो वू समचार।
बीज खंदावो पीव सा,गोद भरो भरतार।।
दूनो भर कै बीज को,बोल्या सा भरतार।
लेजा म्हारो बीज थू,राणी नै दै जार।।
दूनो ले कै हाथ मं,पगसी भरी उडांण।
राणी न्हाळै बाट सा,पूगूं ठाम ठकांण।।
गेला मं भांगो पड़्यो,पगसी लड़ग्यो आर।
दूनो ऊंको कोसल्यो,पगसी पाड़ी बा’र।।
छीना झपटी मं पड़्यो,दूनो नंदी नीर।
मच्छी नंगळ्यो बीज नै,बदी पखेरू पीर।।
बणी अपसरा माछळी,ऊंनै मल्या सराप।
ऊंनै छो यो भोगणो,पुरब जनम को पाप।।
बीज उग्यो सा कोख मं,फूल्यो ऊंको पेट।
धीवर पकड़ी माछळी,हुयो मामलो सेट।।
धीवर चीरी माछळी,करी पेट की खोज।
छोरो छोरी पेट मं,होगी ऊंकै मोज।।
धीवर ग्यो दरबार मं,छोरो छोरी लेर।
छोरो राजो राखल्यो,मान हरी की मे’र।।
धीवर छोरी राखली,ऊबी छो हकदार।
पाळ पोस मोटी करी,पड़गी ऊंकी पार।।
मत्स्यगंधा बासै घणी,ऊंमै आती बास।
रूपवान छी जोर की,सब नै आती रास।।
धीवर की वा लाडली,जाती नतकै लार।
नाव चलाबो सीखगी,मनख कराती पार।।
बूडा ऊंका बापजी,कस्यां पड़ै सा पार।
खूब चलाती नाव वा,लाती रोज कमार।।
रचनाकार-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’
शिवपुरा,कोटा






