डोल शोभायात्रा के साथ होगा मेले का आज आगाज़
-दिलीप शाह –
बारां,13 सितंबर। राजस्थान के हाड़ौती संभाग के बारां तथा इसके आसपास का बसा क्षेत्र जिसे राजस्थान के अनाज का कटोरा कहें अथवा पांच नदियों को बहाने वाला मिनी पंजाब ! भगवान विग्रह की डोल शोभा यात्रा को देखकर हाड़ौती की मथुरा कहें या लोकपर्व तेजा दशमी को देखकर लोक संस्कृति का प्रतीक रामदेवरा। इन सभी का मिलाजुला रूप है कोटा- बारां, भोपाल, जबलपुर रेल लाईन के बीच बसा यह क्षेत्र। पार्वती, परवन तथा कालीसिंध समेत कुछ अन्य छोटी नदियों के मैदानों के मध्य बसा यह क्षेत्र विभिन्न आपदाओं के पश्चात् भी जूझना जानता है और संघर्षों को भी पर्व त्यौहारों के माहौल में भुलाकर मधुर मुस्कान बिखेरना जानता है।
नदिया इसका जीवन है तो प्रकृति ने भी भरपूर कृपा बरसाई है। उसी तरह प्रकृति की गोद ने भी यहां के लोगों को संवारा है। यदि धनिया, सरसों, सोयाबीन तथा बासमती चावल उगाकर बारां राजस्थान ही नहीं वरन् देशभर में अपनी ख्याति में छाया रहता है, तो डोल शोभा यात्रा जैसे मेलों से भी अन्य राज्यों के लोगों को आकर्षित भी किया है।
हाड़ौती का ही नहीं वरन् राजस्थान एवं पड़ौसी मध्य प्रदेश के दूरदराज क्षेत्रों तक ख्याति प्राप्त कर चुके बारां के लोकजीवन का प्रतीक, धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत प्रसिद्ध डोल मेला इस वर्ष भी भाद्रपद शुक्ला जलझूलनी ग्यारस को शहर के विभिन्न पांच दर्जन मन्दिरों के विमानों (डोल) में विराजे भगवान की गाजेबाजो तथा अखाड़ों के हैरेत अंगेज प्रर्दशन के साथ निकलने वाली शोभायात्रा के साथ 14 सितम्बर को प्रारंभ हो जाएगा। एक पखवाड़े तक लगने वाले इस मेले को भव्यता प्रदान करने के लिए नगर परिषद प्रशासन जिम्मा संभाले हुए है।
डोल मेला कब से, निश्चित नहीं –
बारां का यह ऐतिहासिक डोल मेला कब से प्रारंभ हुआ इस बारे में बुजुर्ग बस इतना कहते हैं कि जब से उन्होने होश संभाला तब से ही डोल मेला देखते आए हैं। यह बताते हैं कि आज से 80-90 साल पूर्व बारां का यह डोल मेला मात्र दो-तीन दिन का होता था। हाॅट की तरह ठेलों, तम्बुओं में गांव की दुकाने लगती थी। लेकिन समय के साथ यहां के लोगों की श्रद्धा बढ़ी और आज यही मेला एक पखवाड़े तक लगता है। कहते हैं कि कोटा संभाग के अलावा मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के कई कस्बाई क्षेत्रों से व्यापारी इस मेले में खरीद- फरोख्त के लिए आते हैं।
मेले का आकर्षण देव विमानों की शोभायात्रा…
यद्यपि मेले का यूं तो अपना आकर्षण होता है, लेकिन बारां के डोल मेले का आकर्षण पूरे शहर के विभिन्न जातियों के मन्दिरों से देव विमानों (डोल) की गाजे-बाजों से निकलने वाली शोभायात्रा होती है। इस शोभायात्रा को देखने एवं दर्शनार्थ लाखों नर-नारी, बच्चे, नौजवानों की भीड़ का उमड़ता सैलाब होता है। विमानों की शोभायात्रा के आगे भजन कीर्तन मण्डलियां होती है और उसके आगे सहस्त्रो युवकों एवं अखाड़ेबाजों के मल्ल तथा शारीरिक कौशल के अनूठे हैरत अंगेज कर देने वालें करतबों को देखकर तो दर्शनार्थी दांतो तले उंगली दबा लेते हैं।
अखाड़ों के करतबों को दिखाने की यह परम्परा कहते हैं, डोल मेले के साथ ही प्रारंभ हुई। इसका उद्भव 1940-42 काल का कहा जाता है।
शोभायात्रा की कई मान्यताएं है विद्यमान –
डोल शोभा यात्रा को लेकर कई मान्यताएं विद्यमान है। कहते हैं इस दिन भगवान श्रीविग्रह अपने विमान यानि डोल में बैठकर विचरने निकलते हैं। दूसरी यह कि इस दिन श्रीकृष्ण की माता गाजे-बाजों के साथ कृष्ण जन्म के 18 वें दिन सूर्य एवं जलवा पूजन के लिए घर से निकलती है। कुछ का मानना है कि विभिन्न मन्दिरों में विराजे भगवान प्रकृति की हरियाली का वैभव एवं सौन्दर्य निहारने निकलते हैं।
बदलते समय में भी नहीं बदली परम्पराएं –
यद्यपि समय के साथ परम्पराएं बदल जाया करती है, लेकिन बारां के साथ सत्य साबित नहीं हुआ। वर्षों पुरानी परम्परा आज भी कायम है। श्री कल्याणराय, श्रीजी मन्दिर से विमानों की शोभायात्रा शुरू होती है। रघुनाथ मन्दिर का भी विमान सबसे आगे होता है। इस मन्दिर को राजमन्दिर कहा जाता है। यह विमान मन्दिर के बाहर आकर रूक जाता है। जहां श्रीजी और रघुनाथ जी के विमान गले मिलते हैं। यह परपम्रा आज भी जीवंत है। इस दृश्य को देखने हजारों लोग टूट पड़ते है और दर्शन पाकर धन्य समझते हैं।
उमड़ता है दर्शनार्थियों का सैलाब –
डोल शोभा यात्रा के दौरान बारां शहर के बाजारों तथा मकानों, दुकानों की छतों पर काफी तादाद में जनसमूह शोभायात्रा के दर्शनार्थ एकत्र हो जाता है। बाजारों में तो तिलभर भी जगह नहीं होती। धक्का मुक्की, भीड़ की रेलमपेल बनी रहती है। बुजुर्गवार बताते हैं कि श्रीजी एवं रघुनाथ जी के विमान गले मिलने के बाद जब रघुनाथ मन्दिर का विमान आगे हो जाता है तो स्वतः रास्ता भी हो जाता है। इसे लोग भगवान की कृपा मानते हैं। फिर अन्य मन्दिरों के विमान कतारबद्ध पीछे चलते हैं। शोभायात्रा में उंच-नीच की निरर्थक भावना किसी के मन में परिलक्षित नहीं होती। विभिन्न जातियों के साथ वाल्मिकी (हरिजन) समाज का अखड़ा, विमान भी होता है।
शंख, घण्टा ध्वनि के साथ होता है सामूहिक जलवा पूजन –
विमानो की यह शोभायात्रा सांध्य होते हीं डोल मेला स्थित तालाब पर पहुंच जाती है, जिसके किनारे यह विमान रख दिये जाते हैं। जहां देवी देवताओं को नूतन जल विश्राम करवाया जाता है। उसके बाद शंखनाथ, घंटा, ध्वनि, झालर आदि कई वाद्य यत्रों की ध्वनि एवं जय- जयकार के उद्घोषों के साथ सामूहिक महाआरती होती है। यह दृश्य भी काफी आकर्षक होता है, लोग श्रद्धा से भावभिहीन हो उठते हैं। इस आलोकिक दृश्य को देखकर हरिद्वार की गंगा आरती का स्मरण हो जाता है। धार्मिक श्रद्धा, लोकानुरंजन एवं व्यवसाय का मिश्रित रूप बारां का यह डोल मेला काफी ख्याति अर्जित कर चुका है।
मेला का यह है इतिहास –
बारां में स्थित कल्याणरायजी, श्रीजी का मन्दिर जहां से शोभायात्रा शुरू होती है, वह 600-800 वर्ष पुराना बताया जाता है। इतिहास में उल्लेख है कि बून्दी के महाराव सूरजन हाड़ा ने रणथम्भौर का किला अकबर को सौंप दिया था। उस समय वहां से 02 देव मूर्तियों को लाया गया था। उनमें एक रंगनाथजी की तथा दूसरी कल्याणरायजी की थी। रंगनाथ जी की मूर्ति को बून्दी में स्थापित किया गया और कल्याणराय जी की मूर्ति को बारां लाया गया था। बून्दी की तत्कालीन महारानी ने यहां श्रीजी के मन्दिर का निर्माण करवाया और मूर्ति यहां स्थापित की।
———————————–मन्दिर से सटी है मस्जिद, देती है साम्प्रदायिक सद्भाव का पैगाम –
बारां। कल्याणरायजी के श्रीजी मन्दिर से सटी यहां एक मस्जिद भी है जो जामा मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह मस्जिद मन्दिर के वर्षों बाद बून्दी की ही रानी ने बनवाई थी, उस समय बारां जिले का शाहबाद उपखण्ड औरंगजेब की छावनी था। रानी को आशंका थी की उसके परिवार द्वारा बनाये गये श्रीजी के मन्दिर को मुस्लिम सम्राट क्षति पहुंचाएगा, इसलिए उन्होने मन्दिर की रक्षा के लिए उक्त मस्जिद का निर्माण करवाया था। आज यह मन्दिर-मस्जिद डोल मेला व शोभायात्रा के दौरान साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल भी देता है।




