नज़्म
शकूर अनवर
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इतनी फ़ुर्सत कहाँ
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हमने सोचा कभी
साफ़ शफ़्फ़ाफ़*पानी की नेमत
हमें किसने दी
ज़िंदगी जैसी अनमोल दौलत
हमें किसने दी
किसने बख़्शी समन्दर को गहराइयाँ
कौन बैठा चलाता है पुरवइयाॅं
हमने सोचा कभी
किसने पर्बत,नदी,झील,झरने बनाये
हमारे लिये
किसने जंगल बिछाये हमारे लिये
चाॅंद तारे सजाये हमारे लिये
हमने सोचा कभी
किस तरह सोचते
हम तो अपने बनाये हुए जाल में
इस तरह खो गये
ख़ुद ग़रज़* हो गये
ये भी सोचा नहीं
जिसने पैदा किया
जिसने ये सब दिया
हम उलझते रहे
उसके हर नाम से
उसके हर काम से
जिसने दुनिया बनाई हमारे लिये
हमने उसकी ही सत्ता के टुकड़े किये
अपनी अपनी हुकूमत बनाकर यहाँ
दैरो-काबा*-कलीसा* की बुनियाद रखकर यहाँ
हम झगड़ते रहे
अपने इतिहास पर
उसके विशवास पर
हम नहीं कर सके
उसकी तशहीर* को
अम्न से प्यार से
काम हमने किया
ये भी तलवार से
हम लड़ाते रहे
उस निराकार को
उसके आकार से
हमने सोचा नहीं,कुछ भी सोचा नहीं
सोचने की हमें,
इतनी फ़ुर्सत कहाँ,,,,
*
शब्दार्थ
शफ़्फ़ाफ़*बिल्कुल साफ,पारदर्शी
ख़ुद ग़रज़*मतलबी
दैरो-काबा*मन्दिर मस्जिद
कलीसा*गिरिजाघर,चर्च
तशहीर*प्रचार प्रसार
शकूर अनवर
9460851271






