Wednesday, April 22, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर

ग़ज़ल

शकूर अनवर

दिन भर का जो भूखा होगा।

रात को कैसे सोया होगा।।

 

उनके घर शहनाई बजेगी।

अपने घर सन्नाटा होगा।।

 

कल की रात भी बाहर गुज़री।

उसने क्या-क्या सोचा होगा।।

 

बोझिल- बोझिल ऑंखें उसकी।

रात गये तक जागा होगा।।

 

बॅंटवारे से दूर ही रहना।

इसमें तेरा मेरा होगा।।

 

ख़ून-ख़राबा छोड़ो वर्ना।

कल का सूरज काला होगा।।

 

होगा तो वो घर के अन्दर।

फिर भी मुझको टाला होगा।।

 

शहर बना है शहरे-ख़मोशाॅं*।

कैसे शोर-शराबा* होगा।।

*

जैसे तैसे शाम ढलेगी।

और भी साया लम्बा होगा।।

*

वक़्त ने करवट बदली “अनवर”।

अब जो होगा अच्छा होगा।।

*

शब्दार्थ:-

शहरे-ख़मोशाॅं*क़ब्रिस्तान

शोर-शराबा* बेहद शोर धूमधाम

*

शकूर अनवर

9460851271

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