बेद मांडग्या ब्यास
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काया दी जद राम नै,उजळी न’ज बेदाग।
करम कजोड़ो सोरल्यो,भरल्या संदा राग।।
काम रोस मद लोभ का,भरल्या जी भंडार।
भोग भोगल्या डील सूं,करद्यो सा बेमार।।
कमडळ भरग्या ग्यान का,बेदब्यास छा बीस।
बांच ब्यास का ग्यान नै,लुळज्या म्हांको सीस।।
पींदै राखै सायरो,ऊपर मारै चोट।
तन मन दोनी ऊजळै,गरू खाडदै खोट।।
मन की दबद्या मेट दै,गरू देव को ग्यान।
मनख जमारो तार दै,ग्यान गरू भगवान।।
धजा धरम की तांण दै,मेटै जग जंजाळ।
ग्यान नीर का बापजी,भर दै सरवर खाळ।।
खाड कजोड़ो फांक दै,काया देवै माज।
चरण बंदना म्हूं करूं,गरू देव माराज।।
मन की भटकण रोक दै,खूंटै देवै बांध।
ग्यान नीर सूं ऊजळै,भरै सबर का बांध।।
हरी भजन सूं जोड़ दै,सतगुर सा दातार।
गरू मलादै सांवरो,कर दै बेड़ो पार।।
जनम मरण की बांधणी,जीव सबी लाचार।
गरू देव की नाव सूं,होवां भव सूं पार।।
गरू ग्यान अणमोल छै,ईंमैं सबको सीर।
ग्यान घोट पीवां सबी,मटज्या संदी पीर।।
सूधो गेलो जीव नै,करणो पड़ै तलास।
बेद बांच लां आपणा,बेद मांडग्या ब्यास।।
रचनाकार-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’
शिवपुरा,कोटा




