ग़ज़ल
शकूर अनवर
कोई मुझको बतलाये मेरी इक पहेली है।
पत्थरों की बस्ती में काॅंच की हवेली है।।
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क्यूँ मेरे मुक़द्दर में इस क़दर ॲंधेरे हैं।
क्या मेरी ये क़िस्मत भी रात की सहेली है।।
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फूल उसके उपवन के ख़ुशबुओं से ख़ाली हैं।
बेल उसके ऑंगन की नाम की चमेली है।।
ज़िंदगी की राहों में ख़ार* हैं बबूलों के।
पाॅंव में फफोले हैं ख़ूॅं-चकाॅं* हथेली है।।
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रात के ॲंधेरे में नोचकर न खा जायें।
हर तरफ़ दरिन्दे* हैं ज़िंदगी अकेली है।।
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जिसके दर-दरीचों* पर वहशतों* का मस्कन* हो।
बे-चराग़* ऑंगन हो वो मेरी हवेली है।।
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इस बरस भी हम “अनवर” कब रहे ठिकाने से।
इस बरस की बारिश भी हमने सर पे झेली है।।
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शब्दार्थ:-
ख़ार*काॅंटे
ख़ू चका*ख़ून से सनी हुई
दरिंदे*जंगली जानवर
दर दारीचों*दरवाज़े और खिड़की
वहशतों*डर भय
मस्कन* निवास
बे-चराग़*रोशनी विहीन
शकूर अनवर
9460851271






