ग़ज़ल
शकूर अनवर
प्रेम का हमको ज्ञान नहीं है।
ये मुश्किल आसान नहीं है।।
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जिस घर में मेहमान नहीं है।
उसके घर भगवान नहीं है।।
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तुम क्या हो ये साबित करदो।
क्या ख़ुद से पहचान नहीं है।।
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सूरज को सूरज ही समझो।
इसमें कुछ अपमान नहीं है।।
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मरघट का सन्नाटा क्यूँ है।
ये दुनिया शमशान नहीं है।।
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वो शब्दों के तीर न छोड़े।
ऐसा भी नादान नहीं है।।
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थम सी गई लहरों की हलचल।
दरिया में तूफ़ान नहीं है।।
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मॅंहगाई के दौर में “अनवर”।
मरना भी आसान नहीं है।।
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✍शकूर अनवर
📞946085127






