आत्मनिर्भरता की डगर: 18 की उम्र में स्वावलंबन और श्रम की गरिमा
क्यों जरूरी है छात्रों का आत्मनिर्भर होना?
लेखक: परमानन्द गोयल, कोटा (राजस्थान)
रेस्टोरेंट में टेबल साफ करने वाला छात्र शाम को उसी गर्व और आत्मविश्वास के साथ कॉलेज की कक्षा में बैठता है – यह समाज में श्रम की गरिमा का जीवंत प्रमाण है।
पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी में 18 वर्ष की आयु को केवल कानूनी वयस्कता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। वहां हाई स्कूल पूरा करते ही अधिकांश युवा कॉलेज की फीस, आवास और दैनिक खर्च स्वयं उठाने का संकल्प लेते हैं।
मैंने अमेरिका में अपने दो प्रवासों के दौरान इसे प्रत्यक्ष देखा कि वहां काम को लेकर कोई छोटा-बड़ा नहीं है। कॉलेज के छात्र मॉल, शोरूम, रेस्टोरेंट और होटलों में सामान्य रूप से काम करते मिलते हैं। भारत में भी छात्र काम करते हैं, पर मूल अंतर यह है कि यहां अक्सर आर्थिक विवशता के कारण काम किया जाता है, जबकि अमेरिका जैसे देशों में संपन्न परिवारों के छात्र भी आत्मनिर्भरता के संस्कार के रूप में कुछ घंटे काम करते हैं। वहां प्रति घंटा के हिसाब से जॉब मिलना इस व्यवस्था को आसान बनाता है।
बचपन से ही पड़ती है नींव
वहां आत्मनिर्भरता की नींव कॉलेज से नहीं, घर की दहलीज से ही पड़ जाती है। कपड़े धोना, बर्तन साफ करना, सफाई, बगीचे की देखभाल और भोजन पकाना जैसे कार्य परिवार के सभी सदस्य मिलकर करते हैं। भारत में जहां मध्यम और उच्च वर्ग इन कार्यों के लिए सहायकों पर निर्भर है, वहीं वहां यह व्यक्तिगत जिम्मेदारी का हिस्सा है। बच्चे छोटी उम्र से ही अपने कमरे और रोजमर्रा के काम स्वयं करते हैं, जिससे उनमें यह समझ बनती है कि अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना स्वाभिमान के विपरीत है।
विश्वविद्यालय में आते ही वे बिना हिचकिचाहट के कार्यक्षेत्र में उतर जाते हैं। कोई शॉपिंग मॉल में बिलिंग संभालता है, कोई कैफे में ऑर्डर लेता है, तो कोई क्लीनिक में रिसेप्शनिस्ट का काम करता है। तकनीकी दक्ष युवा कंटेंट राइटिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग और कोडिंग जैसे फ्रीलांस प्रोजेक्ट से कमाते हैं। संस्थान स्वयं लाइब्रेरी और लैब में ‘वर्क-स्टडी’ के अवसर देते हैं।
रूढ़ धारणा से आगे का सच
इस व्यवस्था से छात्रों को पढ़ाई के साथ व्यावहारिक दुनिया का अनुभव मिल जाता है। हमारे यहां यह रूढ़ धारणा है कि पार्ट-टाइम काम से पढ़ाई बिगड़ेगी, जबकि सच यह है कि इससे वित्तीय अनुशासन और पैसे की कद्र विकसित होती है। 15 क्रेडिट घंटे की पढ़ाई के साथ 20 घंटे की शिफ्ट को साधना उन्हें समय प्रबंधन और परिपक्वता सिखाता है।
भारत में आज भी पार्ट-टाइम काम करने वाले छात्र को कई बार सहपाठियों द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता है, जिससे मनोबल टूटता है। हॉस्टल में यदि अन्य छात्र समृद्ध घरों से हों तो यह चुनौती और बढ़ जाती है।
मैंने स्वयं 20 वर्ष की आयु से कॉलेज के साथ पार्ट-टाइम कार्य शुरू किया था। आर्थिक आवश्यकता पर विचार किए बिना मेरे बच्चों ने भी यही राह अपनाई। टॉपर न बन पाने जैसा नुकसान संभव है, पर लाभ कहीं बड़े हैं। इसी संस्कार से मेरे पुत्र ने पढ़ाई के साथ कार्य के प्रारंभिक 5 वर्षों को छोड़ दें किंतु 23 वर्ष की आयु के बाद व्यवसाय में असफलता को निकट नहीं आने दिया और पुत्री ने अमेरिका में पहले नौकरी और फिर ‘Active Fit 360’ फिजियोथेरेपी एवं वेलनेस सेंटर स्थापित कर सफलता के नए आयाम गढ़े। राह में खड्डे, पहाड़ और तूफान सबके सामने आते हैं, निर्भर करता है जुनून और मेहनत पर।
आज के युवाओं के लिए रास्ते
भारत में भी अब दो प्रमुख रास्ते खुले हैं। पहला, वर्क-फ्रॉम-होम – कंटेंट राइटिंग, अनुवाद, Canva, Premiere Pro से डिजाइनिंग, और Chegg, Cuemath पर ऑनलाइन ट्यूटर। दूसरा, ऑन-ग्राउंड – स्कूली बच्चों को ट्यूशन, इवेंट्स में वीकेंड कोऑर्डिनेशन, Decathlon या बुक कैफे में 4 से 6 घंटे की शिफ्ट और कॉलेजों में ‘अर्न व्हाइल यू लर्न’ योजना।
संतुलन के लिए तीन बातें जरूरी हैं। एक, सप्ताह में 10 से 15 घंटे से अधिक काम न लें। दो, काम तलाशने से पहले छोटा पोर्टफोलियो तैयार रखें। तीन, रजिस्ट्रेशन फीस मांगने वाले फ्रॉड से बचें, सच्चा रोजगार कभी अग्रिम पैसा नहीं मांगता।
माता-पिता का उच्च शिक्षा और विवाह तक का भार उठाना गहरे स्नेह का प्रतीक है, पर यह अति-संरक्षण नई पीढ़ी को संघर्षों से अनजान बना देता है। समय आ गया है कि हम ‘श्रम की गरिमा’ को जीवन का आधार बनाएं। जब युवा 18 की दहलीज पर ही आत्मनिर्भरता चुनेगा, तभी सशक्त राष्ट्र बनेगा।





