वैयावृत्त्य और विवेकपूर्ण दान से होती है पुण्य की वृद्धि : मुनि श्री योगसागर जी महाराज
व्रती और संयमी जनों की सेवा ही सच्चे वात्सल्य की पहचान, योग्य पात्र को श्रद्धापूर्वक दान देने का किया आह्वान
कोटा, 29 अक्टूबर । श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार की प्रवचन श्रृंखला में श्लोक क्रमांक 112 एवं 113 की व्याख्या करते हुए वैयावृत्त्य और दान के महत्व पर प्रकाश डाला। मुनिश्री ने कहा कि व्रती एवं संयमी जनों की सेवा करना, उनके कष्टों को दूर करना तथा जरूरतमंद साधर्मी श्रावकों की सहायता के लिए तन, मन और धन से प्रयास करना प्रत्येक श्रावक का महत्वपूर्ण कर्तव्य है।
वैयावृत्त्य से प्रकट होता है सच्चा वात्सल्य
मुनिश्री ने बताया कि वैयावृत्त्य का अर्थ सम्यग्दर्शन आदि गुणों के प्रति प्रीति रखते हुए व्रतधारी एवं संयमी साधु-संतों पर आने वाली विभिन्न प्रकार की विपत्तियों को दूर करना है। उनके शारीरिक कष्टों का निवारण करना, आवश्यकतानुसार सेवा करना तथा गुरु की आज्ञा का पालन करना भी वैयावृत्त्य की भावना से जुड़ा है। मुनि विष्णुकुमार द्वारा सात सौ मुनियों की रक्षा के लिए अपनी ऋद्धि का उपयोग कर संकट दूर करने का प्रसंग बताते हुए उन्होंने सेवा, करुणा और धर्मनिष्ठा की प्रेरणा दी।
मुनिश्री ने कहा कि समाज में परस्पर सहयोग और वात्सल्य की भावना अत्यंत आवश्यक है। आज एकल परिवारों की संख्या बढ़ने के साथ व्यक्ति का ध्यान दूसरों के बजाय स्वयं तक सीमित होता जा रहा है। वात्सल्य के स्थान पर स्वार्थ की प्रवृत्ति बढ़ना सामाजिक समरसता के लिए उचित नहीं है। प्रत्येक श्रावक को चाहिए कि वह दूसरे श्रावक का पूरक बने तथा किसी साधर्मी पर संकट आने पर उसकी सहायता के लिए आगे आए। दूसरों के दुख दूर करने का प्रयास ही सच्चे वात्सल्य और वैयावृत्त्य की पहचान है।
दान में भावना के साथ विवेक भी आवश्यक
श्लोक क्रमांक 113 की व्याख्या करते हुए मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने दान का लक्षण बताते हुए कहा कि सम्यग्दर्शन आदि गुणों से युक्त पात्र मुनिराज को शारीरिक शुद्धि और उचित विधि का ध्यान रखते हुए नवधा भक्तिपूर्वक आहार देना दान कहलाता है। इसके साथ ही साधु-संतों के लिए औषधि, शास्त्र और निवास संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करना भी दान के अंतर्गत आता है।
मुनिश्री ने कहा कि दान केवल वस्तु देने का नाम नहीं है, बल्कि उसमें श्रद्धा, शुद्ध भावना, पात्र की पहचान और विवेक का समावेश होना चाहिए। उत्तम, मध्यम और जघन्य पात्र का विचार करते हुए योग्य पात्र को उचित समय पर आवश्यकतानुसार दिया गया सहयोग ही दान की सार्थकता को प्रकट करता है। दान एवं सेवा का उद्देश्य आत्मकल्याण के साथ-साथ पुण्यबंध और कर्मनिर्जरा की भावना को पुष्ट करना होना चाहिए।
मुनिश्री ने प्रेरणा दी कि प्रत्येक श्रावक अपने जीवन में संयम, सेवा, परोपकार और विवेकपूर्ण व्यवहार को स्थान दे। धार्मिक क्रियाएं तभी सार्थक होती हैं, जब उनके साथ सदाचार और संयम भी जीवन में उतरें। दूसरों के कष्ट दूर करने, साधु-संतों की सेवा करने तथा योग्य पात्र को श्रद्धापूर्वक दान देने से समाज में प्रेम, सहयोग और समरसता का वातावरण निर्मित होता है।
आज के प्रमुख पुण्यार्जक
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ प्राप्त करने वाले परिवारों के नाम तथा कलश स्थापना के पुण्यार्जक परिवार का विवरण प्राप्त होना शेष है।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान राजेन्द्र, हुकम काका प्रकाश हरसोरा परिवार; श्रीमान पारस, श्रीमती नेहा एवं अनादी सिलोरिया परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ने प्राप्त किया।
भक्तामर विधान में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक भाग लेकर पुण्यार्जन किया। श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ चंद प्रकाश जी एवं भुवनेश जी धनोप्या परिवार को प्राप्त हुआ, वहीं मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य अनीता जैन हरसोरा (कमल साउंड) को प्राप्त हुआ।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए तथा जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
गुरुवाणी का अमृत संदेश
“सेवा में वात्सल्य, दान में विवेक और जीवन में संयम—ये सद्गुण आत्मकल्याण के साथ समाज में प्रेम एवं समरसता को बढ़ाते हैं।”
आज के प्रवचन का सार
वैयावृत्त्य व्रत हमें साधु-संतों और जरूरतमंद साधर्मी बंधुओं की सहायता करने की प्रेरणा देता है। विवेकपूर्ण दान का महत्व वस्तु की मात्रा में नहीं, बल्कि श्रद्धा, पात्र की पहचान, उचित विधि और निष्काम भावना में निहित है।
स्वास्थ्य संदेश
सेवा करते समय अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखें। अस्वस्थ, वृद्ध अथवा जरूरतमंद व्यक्तियों की सहायता उनकी आवश्यकताओं और परिस्थितियों को समझकर करें। संतुलित दिनचर्या, संवेदनशीलता और सहयोग की भावना स्वस्थ समाज के निर्माण में सहायक हैं।
धर्मसाधना का संदेश
धर्म का वास्तविक स्वरूप सेवा, करुणा, संयम और परोपकार में प्रकट होता है। साधु-संतों की विनयपूर्वक सेवा करें, संकटग्रस्त साधर्मी की सहायता के लिए आगे आएं और योग्य पात्र को विवेकपूर्वक दान दें। दूसरों के दुख दूर करने का भाव ही सच्चे वात्सल्य और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।






