कोटा शैली की चित्रकला में माँ चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप, प्राकृतिक रंगों और स्वर्ण वर्क से उकेरी गई आस्था
तीन दिन में तैयार हुई हस्तनिर्मित बसली पर बनी पेंटिंग, हिलकारी और बारीक कलात्मक कार्य ने बढ़ाई चित्रकला की भव्यता
चित्रकार शंभू सिंह चोबदार✍️
नवरात्रि के तीसरे दिन माँ दुर्गा के तीसरे स्वरूप माँ चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। माँ चंद्रघंटा को साहस, शक्ति, शौर्य और दुष्टों के संहार का प्रतीक माना जाता है। कोटा की पारंपरिक चित्रकला शैली में माँ चंद्रघंटा के इसी दिव्य, तेजस्वी और पराक्रमी स्वरूप को बेहद आकर्षक ढंग से उकेरा गया है। प्राकृतिक पथरीले रंगों, सोने के वर्क और बारीक हिलकारी के प्रयोग से तैयार यह पेंटिंग हाड़ौती की समृद्ध कलात्मक विरासत और धार्मिक आस्था का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है।
दस भुजाओं में अस्त्र-शस्त्र, सिंह पर विराजमान हैं माता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माँ चंद्रघंटा का वाहन सिंह है। उनका स्वरूप स्वर्ण के समान गौरवर्ण और तेजस्वी माना जाता है। दस भुजाओं वाली माता अपने हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडल, धनुष-बाण और चक्र सहित विभिन्न अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। उनका स्वरूप सदैव युद्ध के लिए तत्पर रहने वाली मुद्रा में दर्शाया जाता है, जो बुराई और आसुरी शक्तियों के विनाश का प्रतीक है। वहीं, उनका एक हाथ भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करने की मुद्रा में रहता है।
माँ चंद्रघंटा का यह स्वरूप भक्तों को निर्भयता, साहस और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर माता की आराधना विशेष श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है।
नारंगी रंग और दूध से बने प्रसाद का विशेष महत्व
माँ चंद्रघंटा की पूजा में नारंगी रंग को विशेष महत्व दिया जाता है। यह रंग ऊर्जा, उत्साह और तेज का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान माता को दूध, दूध से बनी मिठाइयों और खीर का भोग अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है। भक्त माता से सुख, शांति, समृद्धि और शक्ति की कामना करते हैं।
कोटा शैली की चित्रकला में प्राकृतिक रंगों और स्वर्ण वर्क का अनूठा प्रयोग
माँ चंद्रघंटा की इस पेंटिंग को कोटा की पारंपरिक चित्रकला शैली में तैयार किया गया है। इसमें प्राकृतिक पथरीले रंगों और सोने के वर्क का प्रयोग कर माता के दिव्य स्वरूप को विशेष आभा प्रदान की गई है। चित्र की बारीकियों को उभारने के लिए हिलकारी यानी लिक्विड गोल्ड का उपयोग किया गया है, जिससे चित्र में स्वर्णिम चमक और सूक्ष्म कलात्मक विवरण उभरकर सामने आते हैं।
यह पेंटिंग हस्तनिर्मित कागज से तैयार की गई पारंपरिक बसली पर बनाई गई है। इसे पूरा करने में लगभग तीन दिन का समय लगा। रंगों के संयोजन, स्वर्णिम सज्जा और सूक्ष्म रेखांकन के माध्यम से कलाकार ने माता के स्वरूप की दिव्यता और शक्ति को चित्र में साकार करने का प्रयास किया है।
कोटा शैली की यह कलाकृति केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि राजस्थान की पारंपरिक लघुचित्र कला, प्राकृतिक रंगों के उपयोग और पीढ़ियों से चली आ रही कलात्मक तकनीकों की महत्ता को भी रेखांकित करती है। माँ चंद्रघंटा का यह चित्र नवरात्रि के आध्यात्मिक वातावरण में शक्ति, भक्ति और भारतीय कला परंपरा का अद्भुत अनुभव कराता है।






