Sunday, October 11, 2026
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शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की आराधना, कोटा शैली की चित्रकला में झलकती आस्था और कला की अनूठी विरासत

शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की आराधना, कोटा शैली की चित्रकला में झलकती आस्था और कला की अनूठी विरासत

चित्रकार शंभूसिंह चौबदार✍️

कोटा। शारदीय नवरात्र का प्रथम दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। इस दिन श्रद्धालु विधि-विधान से मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना कर सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री की आराधना से जीवन में स्थिरता, सकारात्मकता और आत्मबल प्राप्त होता है।

मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। नवदुर्गा के प्रथम स्वरूप के रूप में उनकी विशेष महिमा है। उनका वाहन वृषभ यानी बैल है। पारंपरिक चित्रण में मां शैलपुत्री के दो हाथ दर्शाए जाते हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल सुशोभित होता है। उनका यह स्वरूप शक्ति, पवित्रता और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है।

सफेद रंग और गाय के घी के भोग का विशेष महत्व

मां शैलपुत्री की पूजा में सफेद रंग का विशेष महत्व माना जाता है। सफेद रंग शांति, पवित्रता, सादगी और सकारात्मकता का प्रतीक है। नवरात्र के प्रथम दिन मां को गाय के घी से बने भोग का अर्पण करने की धार्मिक परंपरा भी प्रचलित है। श्रद्धालु मां से परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

कोटा शैली की चित्रकला में मां शैलपुत्री का दिव्य स्वरूप

हाड़ौती की समृद्ध कला परंपरा को दर्शाती कोटा शैली की चित्रकला में मां शैलपुत्री का स्वरूप विशेष आकर्षण प्रस्तुत करता है। पारंपरिक पथरीले रंगों और स्वर्ण हिलकारी के प्रयोग से तैयार यह चित्र धार्मिक आस्था के साथ-साथ राजस्थान की लघुचित्र कला की बारीकियों और सौंदर्यबोध को भी अभिव्यक्त करता है।

पारंपरिक रंगों का संयोजन, सूक्ष्म रेखांकन और स्वर्ण हिलकारी चित्र को विशिष्ट आभा प्रदान करते हैं। चित्र में मां के दिव्य स्वरूप का अंकन श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति से जोड़ता है, वहीं कोटा शैली की कलात्मक विशेषताओं को भी सामने लाता है।

शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की आराधना और कोटा शैली में उनके स्वरूप का चित्रांकन धर्म, संस्कृति और कला के सुंदर संगम का उदाहरण है। यह चित्र न केवल देवी के प्रति श्रद्धा को प्रकट करता है, बल्कि हाड़ौती की पारंपरिक चित्रकला की विशिष्ट पहचान और सांस्कृतिक विरासत को भी रेखांकित करता है।

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