Sunday, October 11, 2026
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आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जीवन संस्मरणों से अभिभूत हुए ब्रह्मचारी गण

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जीवन संस्मरणों से अभिभूत हुए ब्रह्मचारी गण

गुरु के प्रति समर्पण, संयम और साधना को जीवन में उतारने का दिया संदेश

कोटा, 11 अक्टूबर । शनिवार आश्विन कृष्ण 30 ( अमावस )”पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, दादाबाड़ी नसियां जी, कोटा में शनिवार को परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज के जीवन, व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित अंतरराष्ट्रीय विद्वत ब्रह्मचारी संगोष्ठी का प्रथम सत्र श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक प्रेरणा के वातावरण में आयोजित हुआ। ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे ब्रह्मचारी भैया जी ने आचार्य श्री के प्रेरणादायी जीवन संस्मरणों का स्मरण करते हुए उनके आदर्शों को आत्मसात करने का आह्वान किया।

प्रातः 7:30 से 9:30 बजे तक आयोजित प्रथम सत्र की अध्यक्षता जयपुर से पधारे डॉ. धर्मेंद्र जी ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य श्री विद्यासागर जी पाठशाला, दादाबाड़ी की बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण से हुआ। इसके पश्चात दीप प्रज्वलन एवं चित्र अनावरण कर गुरुचरणों में श्रद्धा अर्पित की गई। कार्यक्रम का संचालन इंदौर से पधारे ब्रह्मचारी श्री सुनील भैया जी ने किया। ब्रह्मचारी श्री अनिल भैया जी के मार्गदर्शन में विभिन्न वक्ताओं ने आचार्य श्री के जीवन, साधना और व्यक्तित्व के विविध पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किए।

आचार्य श्री का जीवन राष्ट्र और समाज के लिए प्रेरणास्रोत

अशोकनगर से पधारे दस प्रतिमाधारी ब्रह्मचारी श्री अशोक भैया जी ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज हथकरघा के माध्यम से स्वावलंबन को बढ़ावा देने और भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित देखने की भावना रखते थे। उनका जीवन त्याग, तपस्या, व्रतों के प्रति निष्ठा तथा शास्त्रों के अध्ययन और उनके व्यावहारिक अनुपालन की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि नमक त्याग, मीठा त्याग, रस त्याग और निर्भीक जीवन जैसे आदर्शों के माध्यम से आचार्य श्री ने आत्मसंयम का संदेश दिया। वे ऐसे अद्वितीय महापुरुष थे, जिन्होंने समाज को नवीन चेतना और दिशा प्रदान की। गुरु की प्राप्ति महत्त्वपूर्ण है, किंतु सच्चा शिष्य वही है, जो पूर्ण समर्पण के साथ गुरु के उपदेशों को अपने जीवन में उतारता है।

शास्त्रों के प्रति अनुराग ही सच्ची गुरु-भक्ति

बीना क्षेत्र से पधारे ब्रह्मचारी श्री संदीप भैया जी ने आचार्य श्री के शास्त्रज्ञान, अध्ययनशीलता और गुरु के प्रति समर्पण का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री का जीवन जैन आगम के प्रति अगाध अनुराग और आध्यात्मिक साधना का अनुपम उदाहरण था। उन्होंने अपने गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में आजीवन समर्पण का भाव बनाए रखा।

उन्होंने कहा कि आचार्य श्री के प्रति सच्ची श्रद्धा यही है कि हम जैन आगम के अध्ययन के प्रति अनुराग बढ़ाएं और उनके निर्देशों का अपने जीवन में पालन करें।

जबलपुर से पधारे ब्रह्मचारी श्री पीयूष भैया जी ने कहा कि आचार्य श्री कम बोलते थे, लेकिन उनकी साधना, कार्य और आचरण स्वयं बहुत कुछ कह जाते थे। उनका संपूर्ण जीवन आत्मानुशासन, साधना और मौन प्रेरणा का अनुपम उदाहरण था।

आचार्य श्री के व्यक्तित्व और कृतित्व का वर्णन शब्दों से परे

ब्रह्मचारी श्री अनिल भैया जी ने अपने मार्गदर्शन में कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के व्यक्तित्व, कृतित्व और आध्यात्मिक महिमा को शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है। उनका जीवन संयम, त्याग और आत्मकल्याण की साधना का विराट उदाहरण है।

उन्होंने आचार्य श्री की व्रत-साधना, प्रतिमाओं के पालन तथा संलेखना और समाधि के प्रति उनकी गंभीर दृष्टि का उल्लेख करते हुए कहा कि वे अध्यात्म जगत के अद्भुत साधक एवं समाधि के आदर्श थे।

सत्राध्यक्ष डॉ. धर्मेंद्र जी, जयपुर ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने स्वावलंबन, निष्पक्षता और विश्वकल्याण की भावना को अपने उपदेशों में प्रमुख स्थान दिया। उनका जीवन समाज को आत्मनिर्भर बनने और व्यापक लोकमंगल की भावना से कार्य करने की प्रेरणा देता है।

संयम के मार्ग में विकल्प नहीं, दृढ़ संकल्प आवश्यक

प्रथम सत्र के समापन अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जीवन से जुड़े अनेक प्रेरक संस्मरण सुनाए। उन्होंने बताया कि आचार्य श्री के जीवन में अपने गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के प्रति अगाध श्रद्धा और समर्पण था।

मुनि श्री ने कहा कि संसार में व्यक्ति जीवनभर मेरा-तेरा, खेती-बाड़ी और सांसारिक विषयों में उलझा रहता है। इन मोह-ममताओं में ही उसका जीवन समाप्त हो जाता है। मनुष्य को विचार करना चाहिए कि उसका जीवन आत्मकल्याण के लिए है या केवल बाहरी उपलब्धियों के लिए।

उन्होंने कहा कि आज का ज्ञान यदि संयम धारण करने में नए-नए विकल्प और बाधाएं उत्पन्न करने लगे, तो वह साधना में सहायक होने के बजाय व्यवधान बन जाता है। संयम के मार्ग पर चलने के लिए दृढ़ संकल्प, निष्ठा और समर्पण आवश्यक हैं।

मुनि श्री ने स्मरण कराया कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अल्पायु में ही ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार किया और 22 वर्ष की आयु में मुनि दीक्षा ग्रहण की। उनका जीवन संदेश देता है कि मोक्षमार्ग पर चलने वाले साधक को राग-रंग और सांसारिक आकर्षणों में आसक्त नहीं होना चाहिए, बल्कि आत्मशुद्धि और संयम को अपने जीवन का लक्ष्य बनाना चाहिए।

आचार्य श्री का साहित्यिक अवदान भारतीय अध्यात्म की अमूल्य धरोहर

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने आचार्य श्री के साहित्यिक अवदान का उल्लेख करते हुए बताया कि पंडित कैलाशचंद जी शास्त्री ने वर्ष 1974 में अपने लेख में आचार्य श्री के जीवन का अवलोकन करने के पश्चात एक नवीन आध्यात्मिक नक्षत्र के उदय होने की भावना व्यक्त की थी।

वर्ष 1975 में आचार्य श्री द्वारा रचित जैन गीता (श्रमण सूक्तम्) सहित उनके अन्य आध्यात्मिक साहित्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आचार्य श्री का चिंतन भारतीय अध्यात्म और जैन दर्शन की अमूल्य धरोहर है। उनका साहित्य साधकों को आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा प्रदान करता है।

गुरु के आदर्शों को जीवन में उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि

संगोष्ठी के प्रथम सत्र में वक्ताओं ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को महामना, अध्यात्मयोगी, संत शिरोमणि, श्रमण संस्कृति का सूर्य, अपराजित साधक, महाकवि, मुखमाटी के प्रणेता और युगद्रष्टा महामनीषी के रूप में स्मरण किया। सभी वक्ताओं ने उनके जीवन संस्मरणों के माध्यम से त्याग, तपस्या, स्वावलंबन, शास्त्र-अध्ययन, गुरु-भक्ति और आत्मकल्याण के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प व्यक्त किया।

अंतरराष्ट्रीय विद्वत ब्रह्मचारी संगोष्ठी का यह प्रथम सत्र आचार्य श्री के प्रति श्रद्धा निवेदन के साथ-साथ उनके विचारों को व्यवहार में उतारने की प्रेरणा देने वाला रहा। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि आचार्य श्री के प्रति सच्चा समर्पण केवल उनके गुणगान तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके बताए संयम, साधना, स्वावलंबन और मानवकल्याण के मार्ग पर चलकर ही उनके उपकारों का वास्तविक प्रतिदान दिया जा सकता है।

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन राजेंद्र जी, रजनी जी एवं समस्त गोधा परिवार द्वारा किया गया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ भी श्रद्धालु परिवार ने प्राप्त किया।

श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार; राजेंद्र जी, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार; सुकांत भैया जी, नारेली; सरोज छापरा तथा ब्रह्मचारी श्री अशोक भैया जी, रविन्द्र कुमार एवं पारस परिवार, टीकमगढ़ द्वारा किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभाव से किया। श्री सुनील माडिया के अनुसार मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ सोनू जी एवं रंजीता जी जैन, जयस्थल वाले परिवार को प्राप्त हुआ। मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य संतोष जी दुगेरिया, पनवाड़ वाले परिवार को मिला। मंगलाचरण का पुण्य अवसर हर्षा कोटिया को प्राप्त हुआ।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

गुरुवाणी का अमृत संदेश

गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल उनके गुणगान में नहीं, बल्कि उनके बताए संयम, त्याग, साधना और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने में है।

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