Saturday, October 10, 2026
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चाणक्य के अवतार श्री हरिकृष्ण बिरला: सत्ता-सुख से दूर, संगठन के अभेद्य किले के शिल्पी — नेपथ्य में इतिहास रचने वाले नायक

चाणक्य के अवतार श्री हरिकृष्ण बिरला

सत्ता-सुख से दूर, संगठन के अभेद्य किले के शिल्पी — नेपथ्य में इतिहास रचने वाले नायक

सत्ता-सुख से दूर, संगठन के अभेद्य किले के शिल्पी और असंख्य लोगों को निस्वार्थ मार्गदर्शन देने वाले व्यक्तित्व, जिनमें से मैं भी एक हूँ – मेरे जीवन को अलग दिशा देने वाले व्यक्ति यदि कोई हैं तो वे हैं श्री हरिकृष्ण बिरला, सबके प्रिय ‘छोटा भाई साहब’।

हाल ही में समाचार पत्रों में उनके बारे में प्रकाशित विशेष वृहद संपादकीय रिपोर्ट – “गांधी नहीं तो क्या हुआ, महात्मा तो हैं: सत्ता-सुख से दूर सांगठनिक चाणक्य श्री हरिकृष्ण बिरला का कौशल और निस्वार्थ समाज सेवा का अमर दर्शन” – को पढ़कर मेरा 37 साल पुराना वह दौर जीवंत हो उठा, जब उन्होंने एक शिक्षक के जीवन की दिशा ही बदल दी।

मेरा परिचय उनसे वर्ष 1988 में मल्टीपरपज स्कूल में शिक्षक के रूप में ज्वाइन करने के बाद हुआ। यह मेरा सौभाग्य रहा कि 1989 में श्री हरिकृष्ण जी बिरला भी भीममंडी स्कूल से व्याख्याता के रूप में मल्टीपरपज स्कूल में स्थानांतरित हुए। उन दिनों मल्टीपरपज स्कूल कोटा शहर का टॉप स्कूल माना जाता था, जहाँ बड़े-बड़े दिग्गज शिक्षक पदस्थापित थे।

इसी दौरान उनका स्नेह और मार्गदर्शन ही था जिसने मुझे राजस्थान लोक सेवा आयोग की चार परीक्षाओं के लिए आवेदन करने को प्रेरित किया। यह मेरे लिए आश्चर्य से कम नहीं था कि संयोग कहें या ईश्वरीय कृपा, चारों में ही चयन हो गया। इनमें से एक – स्कूल व्याख्याता – तो मेरा लक्ष्य था, उसकी प्रतीक्षा थी और मेरिट में फर्स्ट फाइव में चयन हुआ तो ज्वाइन करना ही था।

किंतु स्थिति विकट तब बनी जब एक वर्ष की अवधि में ही व्याख्याता के अलावा लगातार तीन अन्य सेवाओं में भी चयन हो गया। यानि मौजूदा नौकरी के अलावा चार नौकरियां और मेरे सामने थीं। मैं अनिर्णय की स्थिति में था। सभी मित्रों, परिचितों की राय श्री हरिकृष्ण जी बिरला की राय से अलग थी।

उस कठिन डिसीजन मेकिंग के दौर में उनकी राय सबसे भिन्न थी। आज यह बात सीखने वाली है कि किसी व्यक्ति का सही मूल्यांकन करना, उसे गाइड करना और फिर उसकी क्रियान्विति करवाना – यदि ऐसे व्यक्तित्व की तलाश करें और गणित की प्रतिशत में देखें तो पॉइंट के बाद न जाने कितनी शून्य लगाने के बाद अंक दिखाई देगा, इतना दुर्लभ है ऐसे व्यक्तित्व का मिलना।

उन्होंने मुझे जो दिशा दी, उसकी परिणति यह हुई कि मैं वर्ष 2019 में राजस्थान स्टेट सर्विस की ‘ए’ श्रेणी की प्रतिष्ठित सेवा – राजस्थान एकाउंट्स सर्विस से सेवानिवृत्त हुआ। आज यदि मुझे आप सब लोग जानते हैं, तो वह केवल उनकी उस भिन्न और दूरदर्शी राय की क्रियान्विति के कारण ही है, अन्यथा मैं सीमित संख्या के लोगों तक ही जाना जाता और अपना परिचय स्वयं देने की आवश्यकता होती। मैं ईश्वर का शुक्रगुजार हूँ कि उसने मुझे श्री हरिकृष्ण जी बिरला से मिलवाया।

हाल ही के दिनों में समाचार पत्रों में जो तथ्य उजागर हुए, वे मेरे व्यक्तिगत अनुभव को प्रमाणित करते हैं।

संपादकीय रिपोर्ट बताती है कि उनकी पहचान किसी नाम के सहारे नहीं, बल्कि उनके खुद के अचूक सांगठनिक कौशल से है। रिपोर्ट में उन्हें ‘हाड़ौती के अभेद्य चाणक्य’ और ‘किंगमेकर की अद्भुत मिसाल’ कहा गया है। जब भी राजस्थान और विशेषकर हाड़ौती में उनके संगठन की ऐतिहासिक जीतों, प्रचंड बहुमत और क्लीन स्वीप का विश्लेषण होता है, तो राजनीतिक पंडितों की नज़र सीधे छोटे भाई साहब पर टिक जाती है।

वे लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला जी के बड़े भाई हैं, लेकिन जैसा कि समाचार पत्र में लिखा है – उनकी पहचान किसी के नाम के सहारे नहीं है। उनका पार्षद से लेकर संसद तक का अचूक बूथ मैनेजमेंट इतना सटीक है कि बड़े से बड़े चक्रव्यूह उनके हाथों से होकर गुजरते हैं।

रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण तथ्य है – वे वर्तमान में कोटा सहकारी उपभोक्ता भंडार के अध्यक्ष हैं और उन्हें अघोषित दुर्ग के रक्षक के रूप में जाना जाता है।

उनके निस्वार्थ भाव का सबसे बड़ा उदाहरण वही है जिसका उल्लेख पत्र में है – कोटा नगर निगम चुनाव के बाद नव-निर्वाचित पार्षदों और मेयर के साथ संवाद में उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया था कि “पद गाड़ियों पर बत्तियां चमकाने के लिए नहीं, बल्कि जनता की अंतिम पंक्ति की सेवा के लिए हैं।” यही वह दर्शन है जो उन्हें सत्ता-सुख से दूर रखता है।

इसीलिए आज बौद्धिक गलियारों में उनके लिए कहा जा रहा है – “गांधी नहीं तो क्या हुआ, महात्मा तो हैं”। इस टिप्पणी को रिपोर्ट में 1888 में मुंबई के मांडवी कोलीवाड़ा में हुई ऐतिहासिक जनसभा से जोड़ा गया है, जहाँ जनता ने स्वयं समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फुले को ‘महात्मा’ की उपाधि दी थी।

मेरे लिए तो इस लेख में उल्लिखित बात उनके मार्गदर्शन की मात्र एक कड़ी है, यदि उनके द्वारा मुझे दिए गए सभी मार्गदर्शनों को एक साथ लिया जाए तो एक पूरी श्रृंखला बन जाएगी।

निष्कर्ष यही है कि चाहे 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना हो या आज हाड़ौती में अपनी विचारधारा को अभेद्य किला बनाए रखना – दोनों ही इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि इतिहास का असली नायक वह नहीं जो मंच पर चमके, बल्कि वह है जो नेपथ्य में बैठकर पूरे तंत्र को संचालित करे।

मेरे लिए तो वे मंच और नेपथ्य दोनों के नायक हैं।

– परमानन्द गोयल, कोटा (राजस्थान)

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