Friday, October 9, 2026
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पांच दशक से रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ा रहा सुरभि कला केंद्र

पांच दशक से रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ा रहा सुरभि कला केंद्र

1974 में स्वर्गीय श्रीनाथ गौतम ने अभिनय के क्षेत्र में बनाई पहचान, 1976 में रखी संस्था की नींव; अब नई पीढ़ी संभाल रही रंगमंच और रामलीला की विरासत

मयूर टाइम्स न्यूज | विशेष रिपोर्ट ✍️

कोटा। भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और लोक रंगमंच को जीवंत बनाए रखने में रामलीला का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भगवान श्रीराम के जीवन, आदर्शों और मर्यादा को मंच के माध्यम से समाज तक पहुंचाने वाली रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति और रंगमंच की समृद्ध परंपरा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इसी सांस्कृतिक और रंगमंचीय परंपरा को पांच दशक से अधिक समय से आगे बढ़ाने का कार्य सुरभि कला केंद्र द्वारा किया जा रहा है। संस्था की यात्रा के पीछे स्वर्गीय श्रीनाथ गौतम का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्होंने कम उम्र में ही अभिनय के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई और आगे चलकर रामलीला तथा नाट्य मंचन को अपनी सांस्कृतिक साधना का माध्यम बनाया।

सुरभि कला केंद्र के वर्तमान निर्देशक शिवकांत गौतम ने संस्था की लंबी यात्रा, संस्थापक स्वर्गीय श्रीनाथ गौतम के रंगमंचीय योगदान और वर्तमान गतिविधियों के बारे में विस्तृत जानकारी साझा की।

1974 में अभिनय के क्षेत्र में शुरू हुआ सफर

स्वर्गीय श्रीनाथ गौतम के रंगमंचीय सफर की शुरुआत वर्ष 1974 में हुई। इसी दौरान उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया और राजस्थान में इस कला क्षेत्र में प्रथम चयनित कलाकारों में स्थान बनाया।

अभिनय के प्रति उनकी रुचि और प्रतिभा लगातार आगे बढ़ती गई। उन्होंने रंगमंच को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक संदेशों को लोगों तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बनाया।

उनके इसी जुनून और निरंतर प्रयासों ने आगे चलकर एक संगठित सांस्कृतिक संस्था की नींव रखने की दिशा तैयार की।

1976 में रखी गई सुरभि कला केंद्र की नींव

वर्ष 1976 में स्वर्गीय श्रीनाथ गौतम ने सुरभि कला केंद्र की नींव रखी। इसके बाद संस्था के माध्यम से रामलीला और विभिन्न नाट्य प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ।

श्रीनाथ गौतम के पिता पंडित स्वर्गीय नारायण लाल शर्मा मंडाना में अध्यापक के रूप में नियुक्त थे। शिक्षा के साथ-साथ उनका कला और संस्कृति के प्रति भी विशेष लगाव था। पिता से मिली इसी सांस्कृतिक प्रेरणा ने श्रीनाथ गौतम के भीतर रंगमंच के प्रति रुचि को मजबूत किया।

सुरभि कला केंद्र के गठन के बाद संस्था ने रामलीला, नाटक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से धार्मिक एवं लोक परंपराओं को समाज तक पहुंचाने का कार्य शुरू किया।

500 कलाकारों में से श्रीराम की भूमिका के लिए चयन

स्वर्गीय श्रीनाथ गौतम के अभिनय कौशल को शुरुआती दौर में ही पहचान मिल गई थी। भारतेंदु समिति द्वारा करीब 500 कलाकारों में से उनका चयन भगवान श्रीराम की मुख्य भूमिका के लिए किया गया।

वर्ष 1976 में राष्ट्रीय दशहरा मेले के रंगमंच पर श्रीराम की भूमिका में उनके अभिनय को विशेष पहचान मिली। उनके उत्कृष्ट अभिनय के लिए तत्कालीन जिला कलेक्टर रमाकांत अग्रवाल तथा नगर परिषद से जुड़े नंदलाल माथुर द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया।

श्रीराम की भूमिका ने उनके रंगमंचीय सफर को नई पहचान दी और इसके बाद उनका जुड़ाव विभिन्न सांस्कृतिक एवं नाट्य प्रस्तुतियों से लगातार बढ़ता गया।

1977 और 1978 में भी मिला सम्मान

श्रीनाथ गौतम की अभिनय प्रतिभा और रंगमंचीय योगदान को वर्ष 1977 और 1978 में भी सम्मान मिला। इस दौरान दिनेश चंद शर्मा तथा राजस्थान सरकार में मंत्री रहे ललित किशोर चतुर्वेदी द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया।

राष्ट्रीय दशहरा मेले के रंगमंच पर उनके योगदान के लिए उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया द्वारा भी सम्मानित किया गया।

लगातार मिले इन सम्मानों से उनका उत्साह बढ़ा और उन्होंने रंगमंच के माध्यम से सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने के प्रयासों को और विस्तार दिया।

‘रानी रूपमती’ में निभाई मुख्य भूमिका

वर्ष 1980 में श्रीनाथ गौतम ने ‘रानी रूपमती’ नाटक में मुख्य नायक की भूमिका निभाई।

इस प्रस्तुति में उनके अभिनय के लिए तत्कालीन विद्युत मंत्री रघुवीर कौशल तथा ललित किशोर चतुर्वेदी द्वारा उन्हें प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।

लगातार मंचीय अनुभव और सम्मान के साथ सुरभि कला केंद्र की गतिविधियों का दायरा भी बढ़ता गया।

1981 से गांव-गांव पहुंची रामलीला

वर्ष 1981 से सुरभि कला केंद्र ने राजस्थान के विभिन्न शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में रामलीला का मंचन शुरू किया।

संस्था की टीम ने झालरापाटन, बूंदी, रावतभाटा, सीमलिया, केशवरायपाटन सहित कई स्थानों पर रामलीला की प्रस्तुतियां दीं।

वर्ष 1993 में भी कोटा, झालरापाटन, बूंदी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में रामलीला का मंचन किया गया।

संस्था का उद्देश्य रहा कि रामलीला की परंपरा केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहे, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों और नई पीढ़ी तक भी भगवान श्रीराम के आदर्शों तथा भारतीय संस्कृति का संदेश पहुंचे।

2005 में राष्ट्रीय रंगमंच पर रामलीला

सुरभि कला केंद्र की यात्रा में वर्ष 2005 एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा, जब संस्था को राष्ट्रीय स्तर के रंगमंच पर रामलीला मंचन का अवसर मिला।

इस आयोजन में दो संस्थाओं ने मिलकर कार्य किया। राष्ट्रीय मंच पर रामलीला की प्रस्तुति संस्था के कलाकारों और पूरी टीम के लिए महत्वपूर्ण अनुभव रही।

इससे सुरभि कला केंद्र की पहचान स्थानीय स्तर से आगे बढ़कर व्यापक रंगमंचीय क्षेत्र तक पहुंची।

https://www.instagram.com/reel/DeQ6LjXxqRy/?exln=Z3l4cXpsZjJkNWpt

2007 से 2011 तक कोटा में रामलीला

वर्ष 2007 से 2011 तक सुरभि कला केंद्र द्वारा कोटा में रामलीला का मंचन किया गया।

इस दौरान संस्था ने कोटा में रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए। अभिनय के साथ संवाद अदायगी, वेशभूषा, संगीत, मंच सज्जा और प्रकाश व्यवस्था के माध्यम से प्रस्तुतियों को प्रभावी बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया।

2012 से जयपुर में शुरू हुई नई यात्रा

वर्ष 2012 से सुरभि कला केंद्र की रामलीला यात्रा जयपुर पहुंची। संस्था द्वारा जवाहर नगर और आदर्श नगर में रामलीला का मंचन किया गया।

इसके बाद संस्था की गतिविधियां राजा पार्क, आदर्श नगर, जयपुर स्थित रामलीला मैदान तक पहुंचीं, जहां सुरभि कला केंद्र द्वारा रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है।

राजा पार्क, आदर्श नगर स्थित रामलीला मैदान में होने वाली प्रस्तुतियों ने संस्था की सांस्कृतिक यात्रा को नया विस्तार दिया। यहां बड़ी संख्या में दर्शकों के बीच रामलीला के मंचन के माध्यम से धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत रखने का प्रयास किया जा रहा है।

राज्यपाल और जनप्रतिनिधियों ने किया सम्मान

राजा पार्क, आदर्श नगर, जयपुर स्थित रामलीला मैदान में आयोजित होने वाली रामलीला में सुरभि कला केंद्र की प्रस्तुतियों और संस्था से जुड़े पदाधिकारियों को सम्मान भी प्राप्त हुआ है।

संस्था के संस्थापक एवं निर्देशक स्वर्गीय श्रीनाथ गौतम तथा महासचिव नवनीत गौड़ को राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल कलराज मिश्र द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

इसके अलावा विधायक मंजू शर्मा, सांसद रामचरण बोहरा तथा कालीचरण सर्राफ सहित अन्य जनप्रतिनिधियों द्वारा भी संस्था के पदाधिकारियों और कलाकारों को सम्मानित किया गया है।

पांच दशक बाद भी जारी है सांस्कृतिक यात्रा

सुरभि कला केंद्र की यात्रा के दौरान रंगमंच की तकनीक में काफी बदलाव आया। समय के साथ मंच सज्जा, प्रकाश, ध्वनि, वेशभूषा और प्रस्तुतियों के तौर-तरीकों में बदलाव हुए, लेकिन संस्था की मूल भावना आज भी कायम है।

रामलीला के माध्यम से भगवान श्रीराम के आदर्शों, मर्यादा और भारतीय संस्कृति को समाज तक पहुंचाने का प्रयास लगातार जारी है।

नई पीढ़ी संभाल रही विरासत

सुरभि कला केंद्र की खास बात यह है कि स्वर्गीय श्रीनाथ गौतम द्वारा शुरू की गई रंगमंचीय और सांस्कृतिक यात्रा को अब नई पीढ़ी आगे बढ़ा रही है।

संस्था की संरक्षक मंजू गौतम हैं, जबकि वर्तमान में निर्देशक शिवकांत गौतम संस्था की गतिविधियों और रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

नई पीढ़ी के कलाकारों को रामलीला और रंगमंच से जोड़ना संस्था की प्राथमिकताओं में शामिल है, ताकि आने वाले समय में भी भारतीय संस्कृति और लोक रंगमंच की यह परंपरा निरंतर जारी रहे।

कलाकारों के लिए भी बना मंच

सुरभि कला केंद्र ने रामलीला के माध्यम से अनेक कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर दिया है।

रामलीला में अभिनय करने वाले कलाकारों को संवाद अदायगी, मंच अनुशासन, अभिनय, सामूहिक प्रस्तुति और चरित्र निर्माण का अनुभव मिलता है।

इस तरह संस्था केवल रामलीला का मंचन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि रंगमंच की नई प्रतिभाओं को मंच देने और उन्हें तैयार करने में भी योगदान दे रही है।

1974 में अभिनय से शुरू हुआ सफर, आज भी जारी

वर्ष 1974 में स्वर्गीय श्रीनाथ गौतम के अभिनय सफर से शुरू हुई यह सांस्कृतिक यात्रा, वर्ष 1976 में सुरभि कला केंद्र की स्थापना के बाद एक संगठित रूप में आगे बढ़ी।

कोटा और हाड़ौती के विभिन्न क्षेत्रों से लेकर जयपुर के राजा पार्क, आदर्श नगर स्थित रामलीला मैदान तक पहुंची यह यात्रा कई दशकों के सांस्कृतिक समर्पण की कहानी है।

संस्थापक स्वर्गीय श्रीनाथ गौतम ने जिस रंगमंचीय परंपरा को आगे बढ़ाया, उसे अब निर्देशक शिवकांत गौतम और नई पीढ़ी के कलाकार संभाल रहे हैं।

सुरभि कला केंद्र की पांच दशक से अधिक लंबी यात्रा यह दर्शाती है कि समय के साथ मंच और तकनीक बदल सकते हैं, लेकिन संस्कृति, परंपरा और रामलीला के प्रति समर्पण को निरंतर आगे बढ़ाया जा सकता है।

सुरभि कला केंद्र की यह यात्रा केवल पांच दशकों का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, रंगमंच और रामलीला की उस विरासत की कहानी है, जिसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मंच के माध्यम से जीवित रखने का प्रयास लगातार जारी है।

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