पथरीले रंगों, असली सोने के वर्क और पारंपरिक हिलकारी से सजी अनूठी कलाकृति
चित्रकार शम्भूसिंह चौबदार✍️
कोटा। हाड़ौती की समृद्ध चित्रकला परंपरा में कोटा शैली अपनी बारीक रेखांकन, प्राकृतिक रंगों और राजसी सौंदर्य के लिए विशेष पहचान रखती है। इसी पारंपरिक शैली में तैयार की गई श्रीगणेश की आकर्षक पेंटिंग कला, अध्यात्म और शिल्पकौशल का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है।
इस कलाकृति में भगवान श्रीगणेश को राजसी स्वरूप में विराजमान दर्शाया गया है। उनके दोनों ओर रिद्धि और सिद्धि खड़ी होकर चंवर सेवा करती हुई दिखाई गई हैं। यह दृश्य भगवान गणेश के वैभव, सम्मान और दिव्य स्वरूप को प्रदर्शित करता है। चित्र में गणेश जी के मुकुट, आभूषण, वस्त्र और आसपास की सजावटी आकृतियों को बेहद बारीकी से उकेरा गया है।
पथरीले रंगों का पारंपरिक प्रयोग
इस पेंटिंग की खासियत इसमें इस्तेमाल किए गए पथरीले यानी प्राकृतिक रंगों का प्रयोग है। पारंपरिक चित्रकला में प्राकृतिक खनिज एवं मिट्टी से तैयार रंगों का विशेष महत्व रहा है। इन रंगों से चित्र को एक अलग गहराई, ठहराव और पारंपरिक आभा मिलती है।
कलाकृति में लाल, हरे, पीले और गहरे रंगों के संयोजन के साथ महीन रेखांकन किया गया है, जो कोटा शैली की विशिष्ट पहचान को सामने लाता है।
असली सोने के वर्क और हिलकारी ने बढ़ाई खूबसूरती
पेंटिंग की सुंदरता को और निखारने के लिए इसमें असली सोने के वर्क का प्रयोग किया गया है। सोने की चमक भगवान गणेश के मुकुट, आभूषण, सिंहासन और सजावटी हिस्सों को राजसी स्वरूप प्रदान करती है।
इसके साथ ही पारंपरिक हिलकारी का प्रयोग कलाकृति को विशेष उभार और चमक देता है। महीन कारीगरी के कारण चित्र के प्रत्येक हिस्से में बारीकी और जीवंतता दिखाई देती है। सोने के वर्क और हिलकारी का यह संयोजन पेंटिंग को केवल एक धार्मिक चित्र न बनाकर एक विशिष्ट कला-कृति का रूप देता है।
आस्था और कला का सुंदर संगम
पेंटिंग में भगवान गणेश को आशीर्वाद मुद्रा में दर्शाया गया है, वहीं रिद्धि-सिद्धि द्वारा की जा रही चंवर सेवा उनके दिव्य एवं राजसी स्वरूप को और प्रभावशाली बनाती है। नीचे उनका वाहन मूषक भी चित्रित किया गया है, जो धार्मिक प्रसंग को पूर्णता प्रदान करता है।
यह कलाकृति कोटा की पारंपरिक चित्रकला में आस्था, शिल्प, प्राकृतिक रंगों और राजसी सौंदर्य के मेल का उदाहरण है। श्रीगणेश के माध्यम से कलाकार ने न केवल धार्मिक भावनाओं को अभिव्यक्त किया है, बल्कि कोटा शैली की उस विरासत को भी सामने रखा है, जिसमें महीन चित्रांकन और पारंपरिक तकनीकों का विशेष महत्व रहा है।
इस पेंटिंग में श्रीगणेश का दिव्य स्वरूप और रिद्धि-सिद्धि की चंवर सेवा भारतीय कला और संस्कृति की उस परंपरा को दर्शाती है, जहां आस्था केवल पूजा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि चित्रकला के माध्यम से भी जीवंत होती है।




