सरलता, सहजता और निष्कपटता अपनाकर कर्मबंध से बचें : मुनि विवर्धन सागर
कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर स्थित श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के गणधर मुनि श्री विवर्धन सागर जी महाराज ने धर्मसभा को सम्मोधित करते हुए कहा कि मुनि श्री विवर्धन सागर जी महाराज ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी के उपदेशों का श्रवण करना अत्यंत पुण्य का अवसर है। हमें इन उपदेशों को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने पुद्गल के बंध को समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार मिट्टी के कणों को जोड़कर घट का निर्माण किया जाता है, उसी प्रकार पुद्गल परमाणुओं में स्निग्ध और रूक्ष गुणों के कारण बंध होता है। समान गुणों वाले परमाणुओं का बंध नहीं होता, बल्कि स्निग्ध और रूक्ष गुणों के उचित संयोग से बंध की प्रक्रिया होती है।
मुनि श्री विवर्धन सागर जी महाराज ने कहा कि जीव और कर्म का बंध विभाव परिणति के कारण होता है, जबकि स्वभाव परिणति जीव को कर्मों से मुक्त करने वाली होती है। वस्तु के प्रति राग और आसक्ति होने पर जीव बार-बार उसी वस्तु का चिंतन करता है और कर्मों का बंध होता है। इसके विपरीत वस्तु के प्रति उपयोग हटाकर राग-द्वेष से रहित होना अबंध का कारण बनता है।
मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को कर्मबंध के हेतुओं को जानना चाहिए। राग से रहित जीव कर्मों से छूटने की दिशा में आगे बढ़ता है। मिथ्यादृष्टि जीव बंध के कारणों को नहीं समझ पाता और आसक्तिभाव में रहता है, जबकि सम्यग्दृष्टि जीव अनासक्ति भाव को अपनाकर कर्मबंध से बचने का पुरुषार्थ करता है।
मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि प्रवचन में टीकम पाटनी, महावीर बडला, रमेश साकुनिया, निर्मल अजमेरा, ऋषभ बाकलीवाल, आशीष ठोला, अशोक पांडिया, सुरेश देई, संदीप बंसल सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।





