Thursday, September 17, 2026
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कृषि विश्वविद्यालय कोटा में 22-23 सितंबर को आयोजित होगी अखिल भारतीय समन्वित आलू अनुसंधान परियोजना की 44 वीं वार्षिक समूह बैठक

बिगुल जैन ✍️

कोटा। कृषि विश्वविद्यालय, कोटा एवं भा.कृ.अनु.प.-केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (ICAR-CPRI), शिमला के संयुक्त तत्वावधान में अखिल भारतीय समन्वित आलू अनुसंधान परियोजना की 44 वीं वार्षिक समूह बैठक का आयोजन 22-23 सितंबर 2026 को कृषि विश्वविद्यालय, कोटा के सभागार में किया जाएगा।

इस राष्ट्रीय स्तर की वैज्ञानिक बैठक में देश के विभिन्न राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों एवं भा.कृ.अनु.प.-केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थानए शिमला के अंतर्गत संचालित 17 AICRP केंद्रों, CPRI के क्षेत्रीय केंद्र पटना, ग्वालियर एवं मोदीपुरम के 75 वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ आदि के भाग लेने की संभावना है।

बैठक में आलू फसल से संबंधित फसल सुधार, फसल उत्पादन एवं फसल संरक्षण के क्षेत्र में किए गए अनुसंधान कार्यों एवं प्राप्त परिणामों पर व्यापक चर्चा की जाएगी। वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न अनुसंधान प्रयोगों के परिणाम प्रस्तुत किए जाएंगे तथा किसानों के लिए उपयोगी नई किस्मों के विमोचन एवं अनुशंसाओं पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

बैठक का प्रमुख उद्देश्य आलू उत्पादन की वर्तमान चुनौतियों के समाधान के साथ-साथ भविष्य की नवीन एवं उन्नत अनुसंधान रणनीतियों की रूपरेखा तैयार करना है। वैज्ञानिकों द्वारा किसानों एवं वैज्ञानिक समुदाय के लिए उपयोगी तकनीकियों और अनुशंसाओं को अंतिम रूप देने तथा आगामी वर्षों के लिए नवीन अनुसंधान कार्यक्रमों की कार्ययोजना तैयार की जाएगी।

कार्यक्रम में डॉ. विमला डूंकवाल , कुलगुरु कृषि विश्वविद्यालय, डॉ. बृजेश सिंह, निदेशक, भा.कृ.अनु.प.-केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला तथा डॉ. एम. सी. जैन, निदेशक अनुसंधान व आयोजक अध्यक्ष, सहित देशभर से आए वैज्ञानिकगण एवं विशेषज्ञगण सहभागिता करेंगे। इस बैठक के समन्वयक डॉ. बी. एस. मीना, क्षैत्रीय निदेशक अनुसंधान, आयोजक सचिव डॉ. बी. एल. नागर एवं डॉ. डी. एल. यादव रहेंगे।

विश्वविद्यालय के जनसम्पर्क अधिकारी एवं निदेशक, प्राथमिकता निगरानी एवं मूल्यांकन डॉ. मुकेश चन्द गोयल ने बताया कि इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिकों की वार्षिक समूह बैठक के आयोजन से राजस्थान सहित देश के विभिन्न आलू उत्पादक क्षेत्रों में उन्नत किस्मों, वैज्ञानिक उत्पादन तकनीकों एवं प्रभावी फसल संरक्षण उपायों के विकास और प्रसार को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

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