Tuesday, September 15, 2026
Screenshot_2026-02-16-14-04-33-20_6012fa4d4ddec268fc5c7112cbb265e7
previous arrow
next arrow

Top 5 This Week

Related Posts

पाप को तजो, पुण्य तो प्रतिफल में अपने आप मिल जाएगा : मुनि श्री प्रणवसागर जी

कर्मबंधन से बचने के लिए संवर-निर्जरा पर दें ध्यान, निर्मल भावों से प्रशस्त होगा आत्मकल्याण का मार्ग

कोटा, 14 सितम्बर। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी, गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के संघस्थ मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज ने सोमवार को कर्म सिद्धांत पर धर्मसभा को संबोधित किया।

मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को कर्मबंधन से बचने तथा पाप कर्मों के संवर पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जीवन में पाप का त्याग करने का पुरुषार्थ किया जाए तो पुण्य अपने आप प्रतिफल के रूप में प्राप्त होता है। उन्होंने सारगर्भित संदेश देते हुए कहा— “पाप को तजो, पुण्य तो अपने आप हो जाएगा।”

पुण्य प्राप्ति से अधिक महत्वपूर्ण है कर्मों का संवर और निर्जरा

मुनि श्री ने कहा कि हमारा ध्यान केवल पुण्य प्राप्त करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि कर्म संवर और कर्म निर्जरा की दिशा में होना चाहिए। संवर और निर्जरा के मार्ग पर चलने से पुण्य का बंध सहज रूप से होता है। इसके लिए हमारे भाव शुद्ध, निर्मल, श्रद्धायुक्त और प्रसन्न होना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपने भीतर के अशुद्ध भावों को दूर करने और आत्मा को निर्मल बनाने का पुरुषार्थ करता है, तब उसकी साधना सार्थक दिशा में आगे बढ़ती है।

जिनेंद्र भक्ति में वैभव नहीं, भावों की निर्मलता का महत्व

मुनिश्री ने कहा कि जिनेंद्र भगवान की भक्ति में बाहरी वैभव की अपेक्षा भावों की निर्मलता अधिक महत्वपूर्ण है। भक्ति का फल साधन-संपन्नता से नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और निष्कपट भावों से मिलता है।

णमोकार मंत्र के प्रभाव और भक्ति की शक्ति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य के हाथ में अपने भावों को शुद्ध करने का पुरुषार्थ अवश्य है। यदि भाव पवित्र हैं तो साधारण साधन भी आत्मिक उन्नति का माध्यम बन जाते हैं।

दान, पूजा, शील और उपवास आत्मशुद्धि के साधन

मुनि श्री ने श्रावक के कर्तव्यों की चर्चा करते हुए कहा कि दान, पूजा, शील और उपवास केवल धार्मिक क्रियाएं नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि के महत्वपूर्ण साधन हैं। इन क्रियाओं के पीछे भाव निर्मल, निष्कपट और श्रद्धापूर्ण होने चाहिए।

उन्होंने कहा कि दया और करुणा को जीवन का अंग बनाकर मनुष्य पाप कर्मों के संवर तथा निर्जरा की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

हेय को छोड़ना और उपादेय को अपनाना ही धर्म का सार

मुनिश्री ने कहा कि हेय को छोड़ना और उपादेय को अपनाना ही धर्म का सार है। गुरु की आज्ञा, देवपूजा और गुरु-उपासना जैसे धर्मकार्यों को उनके वास्तविक स्वरूप में समझकर यदि हम कर्मों को रोकने में अपना पूर्ण पुरुषार्थ लगाएं, तो पुण्य स्वतः ही बंधेगा।

उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि कर्मबंधन से बचने के लिए निरंतर अपने भावों की शुद्धि करें। पाप का त्याग और आत्मभावों की निर्मलता ही वास्तविक साधना है। जब हेय छूटेगा और शुद्ध भाव जागृत होंगे, तब पुण्य तथा आत्मकल्याण का मार्ग स्वतः प्रशस्त होगा।

अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि वार्ड 86 के चुनाव जीतने के बाद विजयी उम्मीदवार अर्पित जैन ने अपनी कृतज्ञता और आभार प्रकट करने के लिए आराध्य बड़े बाबा व आदिनाथ भगवान (मूलनायक) के दर्शन किए। इसके साथ ही उन्होंने वहां विराजमान पूज्य जैन संतों—निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज और मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी महाराज के चरणों में वंदन कर अपनी जीत के लिए आशीर्वाद प्राप्त किया

🌺 आज के प्रमुख पुण्यार्जक

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर अर्जित किया धर्मलाभ

उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन ने बताया कि चातुर्मास कलश स्थापना का पुण्यार्जन अजीत सीए, अभिनंदन, दीपिका, गोधा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन अनन्त अरिहन्त, सिरसागंज परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

मुख्य संयोजक हुकम काका ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन महावीर कुमार, इन्द्रा एवं राजीव बगड़ा परिवार तथा अनन्त कुमार, अविरल, सिरसागंज द्वारा किया गया। श्रीमती सुशीला बाई, विवेक जी एवं आनंद जी ठोरा परिवार द्वारा माता जी सुशीला बाई के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में बड़े बाबा एवं गुरुजी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए श्रद्धाभावपूर्वक पुण्यार्जन किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन पुण्योदय मंडल के सदस्यों द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य उपवास को प्राप्त हुआ।

श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमान धन्नालाल जी डूगरवाल को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

________________________________________

गुरुवाणी का अमृत संदेश

आज के प्रवचन का सार :

पाप का त्याग करो और अपने भावों को निर्मल बनाओ—पुण्य स्वतः ही प्रतिफल के रूप में प्राप्त होगा। धर्म का उद्देश्य केवल पुण्य अर्जित करना नहीं, बल्कि कर्मों के संवर और निर्जरा की दिशा में आगे बढ़ना है। दान, पूजा, शील, उपवास और जिनेंद्र भक्ति तभी सार्थक हैं, जब उनके पीछे श्रद्धा, समर्पण और निष्कपट भाव हों।

हेय को छोड़कर उपादेय को अपनाएं, पाप कर्मों से बचें और आत्मभावों की शुद्धि का निरंतर पुरुषार्थ करें। यही कर्मबंधन से मुक्ति और आत्मकल्याण की सच्ची दिशा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles