Wednesday, October 28, 2026
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कोटा में मिट्टी की मूर्तियों को प्रोत्साहन – धर्म के साथ पर्यावरण की रक्षा

रिजवान खान की विशेष रिपोर्ट ✍️

कोटा/भारत में गणेश चतुर्थी का पर्व महाराष्ट्र में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन अब यह उत्साह केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। देश के हर शहर की तरह हमारे कोटा शहर में भी गणेश चतुर्थी धार्मिक श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है।

इसी धार्मिक महत्व को देखते हुए कोटा जिला कलेक्टर महोदय द्वारा इस वर्ष दो महत्वपूर्ण स्थानीय अवकाश घोषित किए गए हैं –

14 सितंबर, सोमवार : गणेश चतुर्थी

25 सितंबर, शुक्रवार : अनंत चतुर्दशी / गणेश विसर्जन

कोटा की अनंत चतुर्दशी – भव्य परम्परा

कोटा में अनंत चतुर्दशी का त्योहार भी अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है। इस दिन शहर में विभिन्न अखाड़ों और समितियों द्वारा भव्य झांकियां निकाली जाती हैं और बड़े ही उल्लास के साथ श्री गणेश की मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस विसर्जन शोभायात्रा में शामिल होते हैं। यही वह दिन है जब हमारी आस्था और हमारे जल-स्रोतों की परीक्षा दोनों होती है।

प्लास्टर ऑफ पेरिस से बढ़ता प्रदूषण

पिछले कई वर्षों से बाजार में प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी मूर्तियों का प्रचलन बढ़ गया था। सस्ती और आकर्षक होने के कारण लोग इन्हें खरीदने लगे, परन्तु इसके गंभीर दुष्परिणाम सामने आए। पीओपी पानी में घुलता नहीं है। विसर्जन के बाद यह चंबल नदी, किशोर सागर और अन्य जलाशयों की तलहटी में जमा हो जाता है, जल को प्रदूषित करता है और जलीय जीवों के लिए घातक सिद्ध होता है।

मिट्टी की मूर्ति – जागरूकता की नई लहर

अब अच्छी बात यह है कि लोगों में जागरूकता आई है। लोग समझने लगे हैं कि मिट्टी क्या है और उसका महत्व क्या है। इसी कारण मिट्टी की मूर्तियों का प्रचलन फिर से बढ़ा है।

मिट्टी की मूर्ति पूरी तरह प्राकृतिक होती है, कुछ ही घंटों में पानी में घुल जाती है और प्रकृति में वापस मिल जाती है। इससे नदी भी स्वच्छ रहती है और हमारी सदियों पुरानी कुम्हार परम्परा भी जीवित रहती है।

स्थानीय कारीगरों का संघर्ष और सम्मान

कोटा में इस परम्परा को जीवित रखे हुए हैं हमारे स्थानीय प्रजापति समाज के कारीगर। छत्रपुरा स्थित प्रजापति मूर्ति भंडार द्वारा वर्षों से मिट्टी की सुंदर गणेश मूर्तियां, मटकियां, दीपक और अन्य सजावटी सामान अपने हाथों से तैयार किया जा रहा है।

किंतु आज इन कारीगरों को पीओपी और मशीन से बनी सस्ती मूर्तियों के कारण कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। मिट्टी की मूर्ति बनाने में अधिक समय, मेहनत और लागत लगती है।

हम सभी की भूमिका

1. नागरिकों से अपील: इस बार 14 सितंबर को स्थापना और 25 सितंबर को विसर्जन, दोनों के लिए हम केवल मिट्टी की बनी ईको-फ्रेंडली मूर्ति का ही संकल्प लें।

2. प्रशासन से अपेक्षा: जिला प्रशासन और नगर निगम को चाहिए कि ऐसे मिट्टी के कारीगरों को बाजार में उचित स्थान, प्रचार और प्रोत्साहन दे।

3. पर्यावरण का संदेश: मिट्टी के गणेश जी का संदेश स्पष्ट है – “मिट्टी से बने हैं, मिट्टी में मिल जाएंगे, पर चंबल को गंदा नहीं करेंगे।”

आइए, इस गणेशोत्सव पर हम कोटा में धर्म के साथ-साथ पर्यावरण की भी आराधना करें। मिट्टी के गणेश को अपनाकर हम अपने स्थानीय कुम्हार भाइयों के रोजगार को बचाएंगे और अपनी चंबल को भी स्वच्छ रखेंगे।

प्रजापति मूर्ति भंडार, छत्रपुरा, कोटा पर विभिन्न आकारों में मिट्टी की आकर्षक ईको-फ्रेंडली मूर्तियां उपलब्ध है।

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