ग़ज़ल
✍शकूर अनवर
इस अजनबी दुनिया में शनासा* नहीं मिलता।
मैं ढूॅंढ रहा हूँ कोई अपना नहीं मिलता।।
*
दुनिया में गुनाहों से बहुत दूर रहा हो।
ऐसा तो कोई शख़्स फ़रिश्ता* नहीं मिलता।।
*
चौराहों की मैं भूल-भुलैयाॅं में फॅंसा हूँ।
पहुॅंचादे जो घर पर वही रस्ता नहीं मिलता।।
*
तफ़्तीश* मेरे क़त्ल की फाइल में दबी है।
मक़तल* में कोई ख़ून का धब्बा नहीं मिलता।।
*
ये सिर्फ़ तमन्ना है तमन्ना ही रहेगी।
तपते हुए सहराओँ* में साया नहीं मिलता।।
*
सूरज की हुकूमत में भी ये हाल है “अनवर”।
लोगों को यहाँ धूप का टुकड़ा नहीं मिलता।।
*
शकूर अनवर
शनासा*परिचित
फ़रिश्ता*देवदूत नेक इंसान
तफ़्तीश*जाॅंच इन्वेस्टिगेशन
मक़तल*वधस्थल
सहराओ*रेगिस्तानों
📞9460851271






