Sunday, September 6, 2026
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व्यंग-​’पैसा दो, सम्मान लो’: आधुनिक कला और सम्मान प्राप्त करने का नया बाज़ार

मुस्कुराइए, आप ‘अर्थयुग’ में हैं: सम्मान बिक्री के लिए उपलब्ध है!

यदि आप स्वयं को बहुत बड़ा लेखक, प्रकांड साहित्यकार या कालजयी कलाकार समझते हैं और रातों की नींद इस गम में गँवा रहे हैं कि यह बेदर्द समाज आपकी कालजयी रचनाधर्मिता का उचित मूल्यांकन नहीं कर पा रहा, तो यकीन मानिए—गलती समाज की नहीं, आपकी काल-गणना की है। आप बाईसवीं सदी के मुहाने पर खड़े होकर भी उन्नीसवीं सदी के ‘कबीर’ या ‘ग़ालिब’ बनने की गलतफहमी पाले हुए हैं। आंसुओं को पोंछिए, उदासी का चोला उतारिए और अपनी कलम की स्याही सुखाने से पहले ज़रा अपने बैंक अकाउंट का बैलेंस चेक कीजिए।

आज के इस व्यावहारिक, चमचमाते और विशुद्ध ‘अर्थयुग’ में सरस्वती माता की अनुकंपा से कहीं अधिक असरदार लक्ष्मी जी का ‘क्यूआर कोड’ है। यदि आपकी तिजोरी में कड़क नोटों की गड्डियाँ तैर रही हैं, तो निराशा शब्द को अपनी डिक्शनरी से उठाकर कचरे के डिब्बे में फेंक दीजिए।

सम्मान का नया बाज़ार भाव

वह ज़माना इतिहास के पन्नों में दफन हो चुका जब सम्मान के लिए ‘तपस्या’, ‘साधना’ और ‘योग्यता’ की शर्त हुआ करती थी। अब तो यह सीधा-साधा ‘मांग और आपूर्ति’ (Demand and Supply) का कॉर्पोरेट व्यापार है। साहित्य और कला के बाज़ार में हर चीज़ का रेट कार्ड तय है:

पुरस्कार और मान-पत्र: यदि आपके पास स्पॉन्सरशिप देने का गुर्दा है, तो शहर की चार प्रतिष्ठित संस्थाएँ स्वयं आपके घर का पता ढूँढती हुई आएँगी। वे आपके नाम से एक शाम सजाएँगी और आपको ‘साहित्य शिरोमणि’ या ‘कला रत्न’ का शील्ड थमा जाएँगी।

मुख्य अतिथि का भव्य मंच: पैसा फेंकिए और मंच की सबसे केंद्रीय, गद्देदार कुर्सी पर अपना कब्ज़ा जमाइए। आपको कुछ खास करने की ज़रूरत नहीं है; बस चश्मा ठीक करते हुए गंभीर मुद्रा में सिर हिलाना सीख लीजिए। बाक़ी काम फूलों के बड़े-बड़े गुलदस्ते और पाँच किलो की गेंदे की मालाएँ खुद-ब-खुद कर देंगी।

समीक्षक और चाटुकार मंडल: जो आलोचक कभी आपकी लिखी पंक्तियों पर ‘तुुकबंदी’ का थप्पा लगाकर मुँह बनाते थे, वे लिफाफे का वजन महसूस करते ही आपकी पंक्तियों में कालिदास की उपमाएँ और शेक्सपियर का नाट्य-बोध ढूँढ निकालेंगे। आपकी साधारण सी डायरी के पन्ने को ‘युगगाथा’ घोषित कर दिया जाएगा।

साहित्य साधना का आधुनिक शॉर्टकट

आज की कड़वी सच्चाई यही है—”पैसा फेंक तमाशा देख, पैसा दो सम्मान लो।” यदि आपकी जेब भरी है, तो आपके द्वारा बोला गया हर बेतुका जुमला ‘अमूर्त दर्शन’ मान लिया जाएगा, आपकी अधूरी कूची से बना कैनवास ‘मॉडर्न आर्ट’ के नाम पर लाखों में नीलाम होगा, और आपका बेसुरा राग ‘शास्त्रीय संगीत का नया प्रयोग’ कहलाएगा। इसके विपरीत, यदि आपकी जेब खाली है, तो आप कितना भी महान साहित्य रच लें, आपकी पांडुलिपियाँ रद्दी के भाव भी नहीं बिकेंगी और आप जीवन भर ‘उपेक्षित प्रतिभा’ का लेबल टाँगे फिरेंगे।

इसलिए, यदि आप वास्तव में मान-सम्मान, वाह-वाही और मीडिया की हेडलाइंस चाहते हैं, तो पुस्तकालयों में धूल चाटना और रातों को जागकर पसीना बहाना बंद कीजिए। किसी साहित्यिक गुरु की शरण में जाने के बजाय किसी अच्छे वित्तीय सलाहकार (Financial Advisor) से मिलिए।

कालजयी रचनाएँ लिखने की मशक्कत में उम्र गुज़ारने से बेहतर है कि कुछ ऐसा उद्योग किया जाए जिससे धन का निरंतर प्रवाह बना रहे। जब आपके पास धन होगा, तो सम्मान, मंच, माइक, कैमरे और चाटुकार—सब लाइन लगाकर आपके दरवाज़े पर दास्तान-गोई करते मिलेंगे। आखिरकार, इस आधुनिक दौर में पन्ने पर बिखरी स्याही से कहीं ज़्यादा चमक और ताक़त कड़क नोटों में जो होती है!

 

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